संन्यास या साम्राज्य? धर्म की आड़ में वैभव की कहानी

सनातन नहीं, उसके नाम पर पनपता पाखंड खतरे में है, भगवा वस्त्र, सत्ता की भक्ति और धर्म का संकट

जब संत सत्ता के चरणों में और धर्म सवालों के घेरे में


हरिद्वार। आज देश में जहां भी दृष्टि डालिए, सनातन धर्म की चर्चा सुनाई देती है। राजनीतिक मंचों से लेकर धार्मिक आयोजनों तक, सोशल मीडिया से लेकर जनसभाओं तक, हर ओर सनातन के नाम पर विमर्श चल रहा है। कभी कहा जाता है कि सनातन खतरे में है, तो कभी कोई स्वयं को उसका सबसे बड़ा रक्षक और मसीहा घोषित कर देता है। लेकिन यदि इतिहास के आईने में देखा जाए तो एक बात स्पष्ट रूप से समझ आती है कि सनातन धर्म न कभी किसी व्यक्ति के सहारे खड़ा हुआ है और न ही किसी व्यक्ति के कारण समाप्त होने वाला है।सनातन केवल एक धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने की ऐसी शाश्वत पद्धति है जो हजारों वर्षों के उतार-चढ़ाव, आक्रमणों, सामाजिक परिवर्तनों और राजनीतिक उथल-पुथल के बावजूद आज भी जीवित है। जिस परंपरा ने विदेशी आक्रमणों, सांस्कृतिक चुनौतियों और अनेक प्रकार के संकटों का सामना करते हुए स्वयं को सुरक्षित रखा हो, उसे कुछ राजनीतिक बहसों या चुनावी नारों से खतरा नहीं हो सकता।

वास्तविक चिंता का विषय सनातन धर्म नहीं, बल्कि उसके नाम पर स्वयं को उसका प्रतिनिधि बताने वाले कुछ कथित धर्माचार्य और भगवाधारी हैं। इतिहास साक्षी है कि भारतीय परंपरा में संत और संन्यासी समाज के नैतिक मार्गदर्शक माने जाते रहे हैं। उनकी वाणी सत्ता के लिए दिशा निर्धारित करती थी। राजा धर्माचार्यों से परामर्श लेते थे और राज्य संचालन में धर्म के मूल्यों को महत्व दिया जाता था। धर्म सत्ता और राज सत्ता का संबंध परस्पर सम्मान और मर्यादा पर आधारित था।

लेकिन समय के साथ यह स्थिति बदलती दिखाई दे रही है। आज अनेक तथाकथित धर्मगुरु राजनीतिक सत्ता के समीप रहने को ही अपनी उपलब्धि मान बैठे हैं। किसी बड़े नेता के साथ मंच साझा करना, उद्योगपतियों के साथ तस्वीरें खिंचवाना और उन्हें सोशल मीडिया पर प्रचारित करना मानो आध्यात्मिक उपलब्धि का प्रमाणपत्र बन गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ लोगों के लिए साधना, तपस्या और आत्मचिंतन से अधिक महत्व राजनीतिक संपर्कों और प्रभावशाली व्यक्तियों की निकटता का हो गया है।

संत परंपरा का मूल आधार त्याग माना गया है। संन्यास का अर्थ ही सांसारिक आकर्षणों से दूर होकर समाज और धर्म के लिए समर्पित जीवन जीना है। किंतु जब संन्यास वैभव, शक्ति प्रदर्शन और राजनीतिक समीकरणों का माध्यम बन जाए, तब स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठते हैं। जनता यह जानना चाहती है कि जो व्यक्ति स्वयं सांसारिक मोह-माया से मुक्त होने का दावा करता है, वह सत्ता और प्रतिष्ठा के आकर्षण से कैसे प्रभावित हो जाता है।

बीते दिनों अर्द्धकुंभ और कुंभ को लेकर चले विवाद विषय पर विभिन्न धार्मिक व्यक्तियों की राय अलग-अलग रही, किंतु बहुत कम लोग ऐसे दिखाई दिए जिन्होंने खुलकर अपनी बात रखी। इससे यह धारणा बलवती होती है कि कहीं न कहीं धार्मिक नेतृत्व का एक वर्ग सत्ता से टकराने के बजाय उसके साथ सामंजस्य बनाए रखने में अधिक विश्वास रखता है। लोकतंत्र में यह किसी का अधिकार है कि वह किसी भी पक्ष का समर्थन करे, लेकिन जब धार्मिक नेतृत्व अपनी स्वतंत्रता खो देता है तो समाज में उसकी विश्वसनीयता प्रभावित होती है। इस मुद्दे पर कथित संतों का मत भिन्न है, किन्तु वह विरोध करने की स्थिति में नहीं हैं। यह भली भांति जानते हैं की विरोध किया तो फाईलें खुलना शुरू हो जाएंगी और फिर इनकी स्थिति धोबी का कतका न घर का न घाट का वाली हो जाएगी।

विचारणीय है कि अब ऐसे में यह कथित भगवाधारी जो राज सत्ता चाटुकारिता में लिप्त हों वह धर्म की रक्षा कैसे कर सकते हैं। इनका केवल एक ही ध्येय है की किसी भी प्रकार से इनके धन के रास्ते खुले रहें। इनकी राजनीति भगवा की आड़ में कायम रहे। संन्यासी होने के बाद भी यह गृहस्थ जीवन के आनन्द ले सकें। किसी भी प्रकार का अपराध करने के बाद भी इन पर किसी भी प्रकार की आंच न आए। यही कारण है कि राज सत्ता के समक्ष यह हर समय दंडवत करने के लिए तैयार हैं।

जबकि धर्म का उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज को नैतिक दिशा देना होता है। जब धर्म राजनीति का उपकरण बनने लगे तो उसका मूल स्वरूप कमजोर पड़ने लगता है। दुर्भाग्य से आज कई बार धार्मिक विमर्श आध्यात्मिक उन्नयन के बजाय राजनीतिक लाभ-हानि के चश्मे से देखा जाने लगा है। इससे सबसे अधिक भ्रम आम श्रद्धालु के मन में पैदा होता है।

आज सबसे बड़ा संकट यह है कि समाज के सामने सच्चे और दिखावटी संतों में अंतर करना कठिन होता जा रहा है। बाहरी वेशभूषा, बड़े-बड़े आश्रम, विशाल आयोजन और प्रचार-प्रसार किसी व्यक्ति की आध्यात्मिक ऊंचाई का प्रमाण नहीं हो सकते। भारतीय परंपरा में संत की पहचान उसके ज्ञान, विनम्रता, त्याग, करुणा और आचरण से होती है। कबीर, रविदास, तुलसीदास, स्वामी विवेकानंद और अनेक संतों ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि धर्म का वास्तविक आधार चरित्र होता है, प्रदर्शन नहीं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि सनातन धर्म को व्यक्तियों से नहीं, उसके मूल सिद्धांतों से समझा जाए। सत्य, अहिंसा, करुणा, सेवा, आत्मसंयम और लोककल्याण जैसे मूल्य ही उसकी वास्तविक शक्ति हैं। यदि ये मूल्य जीवित हैं तो सनातन जीवित है। यदि ये मूल्य कमजोर पड़ते हैं तो केवल भगवा वस्त्र धारण कर लेने से धर्म की रक्षा नहीं हो सकती।

यह भी सत्य है कि सभी संतों और धर्माचार्यों को एक ही दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा। आज भी देश में अनेक ऐसे संत, साधु और आध्यात्मिक मार्गदर्शक हैं जो निस्वार्थ भाव से समाज सेवा, शिक्षा, संस्कार और राष्ट्र निर्माण के कार्यों में लगे हुए हैं। वे प्रचार से दूर रहकर अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं। ऐसे लोगों के कारण ही समाज का विश्वास अब भी संत परंपरा में बना हुआ है।

सनातन धर्म का भविष्य किसी राजनीतिक दल, किसी सरकार या किसी एक धार्मिक नेता पर निर्भर नहीं है। उसका भविष्य उस सामान्य श्रद्धालु पर निर्भर है जो अपने जीवन में धर्म के मूल्यों को अपनाता है। जब तक समाज में सत्य, सेवा, सदाचार और आध्यात्मिक चेतना जीवित रहेगी, तब तक सनातन को कोई खतरा नहीं हो सकता।

आज आवश्यकता सनातन को बचाने के नारों की नहीं, बल्कि सनातन के आदर्शों को जीवन में उतारने की है। धर्म की रक्षा भाषणों से नहीं, आचरण से होती है। यदि धर्म के नाम पर नेतृत्व करने वाले लोग स्वयं धर्म के मूल सिद्धांतों का पालन करें, तो समाज में विश्वास स्वतः स्थापित होगा। अन्यथा सबसे बड़ा संकट बाहर से नहीं, भीतर से उत्पन्न होगा।

सनातन की शक्ति उसकी शाश्वतता में है। वह किसी व्यक्ति विशेष का मोहताज नहीं है। इतिहास ने बार-बार यह सिद्ध किया है कि जो धर्म सत्य और नैतिकता पर आधारित होता है, उसे मिटाया नहीं जा सकता। इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि सनातन बचेगा या नहीं, प्रश्न यह है कि सनातन के नाम पर बोलने वाले लोग उसके आदर्शों पर कितना खरे उतरते हैं। यही विचार आज समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है।
स्थिति यह है कि आज बड़ा संकट धर्म परायण जनता के समक्ष आ खड़ा हुआ है। वह यह की आज संत की पहचान नहीं। इनको शास्त्र की समझ नहीं। शास्त्र कुछ कहता है और यह करते और समझते कुछ और ही हैं। ऐसे में धर्म की रक्षा हो तो कैसे हो।

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