बाहरी नशा और भीतरी चेतना: नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात

नशीली दवाओं के दुरुपयोग और अवैध तस्करी के विरुद्ध अंतर्राष्ट्रीय दिवस है आज। बाहर का नशा अपने आप को भुलाने के लिए होता है, जबकि स्प्रिचुअलिटी का नशा इंसान को जाग्रत अवस्था में रखता है। आज सवाल ये है कि ऐसा क्यों है कि जो लोग स्प्रिचुअल हैं, उसके बाद भी वो नशा, स्मोकिंग और ड्रिंकिंग का आनंद लेते हैं? क्या स्प्रिचुअल हाइट से वो संतुष्ट नहीं हैं? या उनको ये भी लगता है कि ये सब तो भगवान शिव भी करते हैं। पहले ये समझना जरूरी है कि ये नशा है क्या। ये जो नशा है, वो इंसान को अपने आप से थोड़ी देर के लिए दूर कर देता है। कोई भी नशा अपने आप को भूलने के लिए किया जाता है। आज नशा भूलने का एक साधन बन गया है।

गुरुनानक देव ने कहा था, “नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात।“ हमें कभी मालूम ही नहीं था कि खुमारी क्या होती है। हम धार्मिक तो थे, मंदिर, गुरुद्वारे, मस्जिद और चर्च जाते थे ; पूजा-पाठ, व्रत और दान सब करते थे। पर कभी यह नहीं सोचा कि यह सब क्यों कर रहे हैं। बाहर का धर्म हमारे लिए एक नशा बन गया था, जिसमें करना ही है, सोचना नहीं है। आंतरिक धर्म के बारे में हमें कभी जानकारी नहीं थी। धर्म का स्वरूप जो संसार ने सिखाया, वो सिर्फ़ बाहरी आवरण है। जैसे शरीर के अंदर आत्मा होती है,वैसे ही धर्म के अंदर आंतरिक धर्म होता है। बाहर का धर्म ‘रिलिजन’ है और अंदर का धर्म ‘स्प्रिचुअलिटी’ है। आत्मिक ज्ञान जरूरी है। बाहर की पूजा हर व्यक्ति करता है, लेकिन अंदर की पूजा कोई विरला ही करता है। बाहर मूर्तियाँ स्थापित की जाती हैं, पर अंदर चेतना की मूर्ति बिठाने के लिए निर्मल अवस्था चाहिए।

संसार में हर इंसान तरक्की चाहता है। नौकरी में, बिजनेस में, हर जगह तरक्की चाहिए। पर धर्म के क्षेत्र में लोग पहली ही पौड़ी पर गिर जाते हैं। भगवद् गीता के अठारह अध्याय पढ़ लेते हैं, पर दूसरा अध्याय जीवन में नहीं उतरता। पढ़ते रहे और मरते रहे, वही माला, वही पूजा। अगर धर्म यहीं खत्म हो जाता, तो गौतम बुद्ध, महावीर ,जीसस, गुरु नानक देव, रामकृष्ण परमहंस, मीरा बाई, संत कबीर जैसे महापुरुष कैसे बनते? उन्होंने बाहर की पूजा नहीं की, अंत में भगवान हो गए। स्प्रिचुअलिटी का मतलब है कम्पलीट नशा। ऐसी खुमारी जो कभी खत्म नहीं होती। यही ‘एनलाइटनमेंट’ है। ये नशा आदमी को बेहोश नहीं करता, बल्कि जाग्रत अवस्था में रखता है। बाहर संसार चलता रहता है, लाभ-हानि, सम्मान-अपमान, जन्म-मृत्यु सब होता रहता है, पर अंदर कुछ नहीं डगमगाता। यही स्थिति प्रज्ञा है, यही सचियार है, यही निर्वाण है।

आज संसार में नशा एडिक्शन बन गया है। यह फैशन के रूप में शुरू होता है, लेकिन बाद में क्लेश का कारण बन जाता है। शराब और सिगरेट शरीर को गलाती है। लंग्स सड़ते हैं और लिवर खराब होता है। एक दिन अस्पताल में जाकर पता चलता है कि क्या भूल करी थी। सांस उखड़ती है, वेंटिलेटर की नौबत आ जाती है। ये नशा इंसान को कमजोर बना देता है।

जब कोई स्प्रिचुअलिटी की यात्रा में आगे बढ़ता है और यात्रा पचहत्तर प्रतिशत पार करती है, तो नशा अपने आप गिरने लगता है। शराब, सिगरेट, माया और आसक्ति सब अपने आप छूटती हैं। गुरु के साथ चलने से हर कदम में सब धीरे-धीरे समाप्त होता चला जाता है। मैंने कभी किसी से नहीं पूछा कि वह पीता है या नहीं; मैं केवल इतना कहता हूँ कि वाणी सुनो। यात्रा जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, तो सब अपने आप मिट जाएगा।
जब ‘महा नशा’ मतलब स्प्रिचुअलिटी का आनंद आ जाता है, तो दूसरा कोई नशा काम नहीं करता। जिस दिन करुणा का सागर भीतर फूटता है, उस दिन किसी जीव का मांस अंदर नहीं जा सकता। यदि बुद्धि से छोड़ोगे, तो फिर पकड़ोगे। इसलिए निरीक्षण करो और आगे बढ़ो। जब अंदर खुमारी आ जाती है, वही सच्चा साधु है- “नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात।

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