हरिद्वार। सनातन परंपरा में संन्यास आश्रम को जीवन का सर्वोच्च और सबसे कठिन मार्ग माना गया है। शास्त्रों के अनुसार संन्यासी वह है जो अपने परिवार, संपत्ति, मोह-माया और सांसारिक संबंधों का पूर्ण त्याग कर केवल परमात्मा की प्राप्ति के लिए जीवन समर्पित कर देता है। संन्यास ग्रहण करने से पूर्व अपने और अपने परिवार का पिंडदान कर यह संकल्प लिया जाता है कि अब उसका जीवन केवल ईश्वर, ज्ञान, तप और लोककल्याण के लिए होगा।
धार्मिक ग्रंथों में वर्णित संन्यासी के जीवन का स्वरूप अत्यंत कठोर बताया गया है। कहा गया है कि संन्यासी के लिए आकाश ही वस्त्र और धरती ही शय्या के समान है। वह किसी प्रकार के संग्रह, वैभव या सुविधाओं का आकांक्षी नहीं होता। यदि भिक्षा या दीक्षा के माध्यम से भोजन मिल जाए तो उसे ईश्वर की कृपा मानकर ग्रहण करता है, अन्यथा “हरि इच्छा” मानकर उपवास करता है। चातुर्मास को छोड़कर तीन दिन से अधिक एक स्थान पर नहीं ठहरता और निरंतर भ्रमण करते हुए धर्म, ज्ञान और आध्यात्मिक चेतना का प्रचार करता है।
संन्यास का मूल उद्देश्य आत्मसाक्षात्कार, वैराग्य और परमात्मा का निरंतर चिंतन है। संन्यासी का प्रत्येक क्षण साधना, तप, सेवा और आत्मकल्याण के साथ-साथ समाज को आध्यात्मिक दिशा देने में व्यतीत होना चाहिए। उसे किसी भी प्रकार के सांसारिक पद, प्रतिष्ठा, अधिकार, संगठनात्मक प्रतिस्पर्धा या राजनीतिक गतिविधियों से स्वयं को दूर रखना चाहिए।
किन्तु क्या वर्तमान समय में संन्यास की मूल भावना कहीं पीछे छूटती जा रही है? कई धार्मिक संगठनों और मठों में पदों को लेकर होने वाले विवाद, गुटबाजी, जोड़-तोड़, प्रभाव की राजनीति तथा प्रतिष्ठा की होड़ को लेकर लगातार चर्चाएं होती रहती हैं। ऐसे घटनाक्रमों के बाद यह बहस तेज हो जाती है कि यदि कोई व्यक्ति सब कुछ त्यागने का संकल्प लेकर भी पद और अधिकार के मोह में उलझा रहे, तो क्या उसे वास्तविक अर्थों में संन्यासी कहा जा सकता है?
संन्यास का अर्थ केवल भगवा वस्त्र धारण करना नहीं, बल्कि मन, वचन और कर्म से पूर्ण वैराग्य अपनाना है। जब तक व्यक्ति अहंकार, पदलोलुपता, सत्ता की इच्छा और सांसारिक आकर्षण से मुक्त नहीं होता, तब तक संन्यास की आत्मा अधूरी मानी जाती है।
यदि कोई गृहस्थ अपने परिवार का पालन-पोषण करते हुए ईमानदारी, सत्य, सेवा, धर्म और सदाचार के मार्ग पर चलता है, तो वह अनेक बार उस व्यक्ति से अधिक श्रेष्ठ माना जा सकता है जो संन्यास का व्रत लेकर भी सांसारिक मोह, पद की लालसा और राजनीतिक गतिविधियों में उलझा रहता है।
संन्यास भारतीय संस्कृति की अमूल्य परंपरा है और उसकी गरिमा बनाए रखना प्रत्येक संन्यासी का नैतिक दायित्व है। यदि संन्यास का मूल स्वरूप त्याग, तप, सेवा और आत्मज्ञान है, तो उसके विपरीत आचरण न केवल समाज में भ्रम पैदा करता है, बल्कि सनातन परंपरा की प्रतिष्ठा पर भी प्रश्नचिह्न खड़े करता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि संन्यास की मूल भावना पर पुनः गंभीर चिंतन हो। समाज भी उन संतों और संन्यासियों का सम्मान करे जो वास्तव में त्याग, तप, सेवा और आध्यात्मिक साधना के आदर्शों का पालन करते हुए सनातन संस्कृति की गरिमा को बनाए रखने का कार्य कर रहे हैं।


