हरिद्वार कुंभ मेला की तैयारियों, साधु-संतों की उपेक्षा और अखाड़ों की भूमिका पर गोपाल गिरि ने खड़े किए गंभीर प्रश्न

हरिद्वार। कुंभ मेले की तैयारियों को लेकर अनेक साधु-संतों और आश्रमों से जुड़े लोगों में असंतोष देखने को मिल रहा है। संतों का कहना है कि मेला प्रशासन और राज्य सरकार समय रहते संत समाज तथा आश्रमों के प्रतिनिधियों के साथ सार्थक संवाद स्थापित नहीं कर पा रहे हैं। उनका आरोप है कि केवल बैठकों का सिलसिला चल रहा है, जबकि जमीनी स्तर पर समस्याओं का समाधान नहीं हो रहा।

श्री शंभू पंचदशनाम आवाहन अखाड़ंे के श्रीमहंत गोपाल गिरि महाराज ने कहाकि नगर क्षेत्र में शिविरों के लिए सड़कें खोद दी गई हैं, लेकिन अब तक उनका निर्माण पूरा नहीं हो पाया है। इससे स्थानीय नागरिकों, व्यापारियों और श्रद्धालुओं को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। जबकि मेले में अब केवल कुछ ही महीने शेष हैं, अनेक कार्य अभी भी अधूरे हैं।

गोपाल गिरि महाराज न आरोप लगाया गया है कि कुछ अखाड़ों ने आर्थिक लाभ के लिए ऐसे निर्णय स्वीकार किए हैं, जो सनातन परंपराओं के अनुरूप नहीं हैं। दावा किया गया कि हरिद्वार में परंपरागत रूप से अर्धकुंभ के दौरान सभी अखाड़े शाही स्नान नहीं करते रहे हैं। ऐसे में इस बार की व्यवस्थाओं तथा निर्णयों को लेकर कई प्रश्न खड़े किए जा रहे हैं।

कहा कि वर्ष 2016 में उज्जैन में सिंहस्थ आयोजित हुआ था और उसी अवधि में हरिद्वार में अर्धकुंभ का उल्लेख किया गया था। अब प्रश्न है कि वर्तमान आयोजन को किस आधार पर कुंभ मेला का स्वरूप दिया गया है तथा इसकी समय-सीमा और परंपरागत आधार क्या हैं। गोपाल गिरि महाराज ने कहा कि इन विषयों पर सरकार और संबंधित संस्थाओं को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए।

गोपाल गिरि महाराज ने विभिन्न अखाड़ों के इतिहास का उल्लेख करते हुए दावा किया गया है कि श्री पंचदशनाम आवाहन अखाड़ा, अटल अखाड़ा तथा महानिर्वाणी अखाड़ा प्राचीन नागा संन्यासी परंपरा के मूल केंद्र रहे हैं। साथ ही यह भी कहा गया है कि समय-समय पर विभिन्न अखाड़ों का गठन हुआ और स्नान की परंपराओं का विकास हुआ। इन ऐतिहासिक दावों के स्वतंत्र प्रमाण और इतिहासकारों की राय अलग-अलग हो सकती है।

गोपाल गिरि महाराज ने अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद की भूमिका पर भी प्रश्न उठाए गए हैं तथा आरोप लगाया कि समय के साथ सरकारों ने धार्मिक संस्थाओं के माध्यम से परंपराओं को प्रभावित किया है। यह वक्तव्य संबंधित पक्षों का दृष्टिकोण है।

मुख्य मांगें
हरिद्वार कुंभ मेले की तैयारियों पर साधु-संतों और आश्रमों के साथ नियमित एवं पारदर्शी वार्ता की जाए।
शिविर क्षेत्रों की सड़कें, जल निकासी और अन्य निर्माण कार्य शीघ्र पूर्ण किए जाएं।
हरिद्वार में अखाड़ों के साथ-साथ आश्रमों को भी समान प्राथमिकता देते हुए शिविरों के लिए भूमि उपलब्ध कराई जाए।
आश्रमों को निःशुल्क टेंट, शौचालय, बिजली, पानी तथा आवश्यक मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।
देवप्रयाग से लेकर ऋषिकेश त्रिवेणी घाट तथा हरिद्वार तक स्नान और श्रद्धालुओं की सुविधाओं की बेहतर व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
आश्रमों और स्थानीय संत समाज को व्यवस्थाओं के संचालन हेतु आवश्यक आर्थिक सहायता प्रदान की जाए।
मेला समिति में हरिद्वार और ऋषिकेश के स्थानीय साधु-संतों एवं आश्रम प्रतिनिधियों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया जाए।
भूमि आवंटन और सुविधाओं के वितरण की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनाई जाए तथा संत समाज की सहभागिता सुनिश्चित की जाए।

गोपाल गिरि महाराज ने कि कुंभ केवल एक प्रशासनिक आयोजन नहीं, बल्कि सनातन धर्म की आस्था, परंपरा और आध्यात्मिक विरासत का महापर्व है। इसलिए इसकी सभी व्यवस्थाएं पारदर्शिता, परंपरा और संत समाज की सहभागिता के साथ की जानी चाहिए।

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