आवाहन अखाड़े ने किया अखाड़ा परिषद (निर्वाणी) गुट को समर्थन का ऐलान

अखाड़ा परिषद की वैधता पर फिर छिड़ा विवाद, श्रीमहंत गोपाल गिरी ने हरि गिरी और जूना अखाड़े पर उठाए सवाल


हरिद्वार। अखाड़ों की व्यवस्था और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद की वैधता को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। श्री शंभू पंचदशनाम आवाहन अखाड़ा से जुड़े श्रीमहंत गोपाल गिरी मढ़ी रिद्धिनाथी गद्दी खालसा ने प्रेस को जारी बयान में हरि गिरी और जूना अखाड़े की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए अखाड़ा परिषद के गठन और संचालन को लेकर कई दावे किए हैं।


श्रीमहंत गोपाल गिरी ने कहा कि श्री शंभू पंचदशनाम आवाहन अखाड़ा वर्ष 547 ईस्वी का सबसे प्राचीन नागा संन्यासी अखाड़ा है। उन्होंने कहा कि अखाड़ों की वरिष्ठता जनसंख्या के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी परंपरा और प्राचीनता के आधार पर निर्धारित होती है। उनका आरोप है कि जूना अखाड़ा स्वयं को सबसे बड़ा अखाड़ा साबित करने का प्रयास कर रहा है, जो परंपराओं के अनुरूप नहीं है।


उन्होंने बताया कि वर्ष 2001 से 2009 तक आवाहन और जूना अखाड़े के बीच विवाद चला। उनके अनुसार वर्ष 2003 में त्र्यंबकेश्वर में आनंद अखाड़े के श्रीमहंत सागरानंद सरस्वती के नेतृत्व में निरंजनी, महानिर्वाणी, आनंद, नया उदासीन, बड़ा उदासीन, निर्मल, अग्नि और आवाहन अखाड़ों ने अलग परिषद का गठन किया था तथा जूना अखाड़े का बहिष्कार किया गया था। उनका दावा है कि वर्ष 2004 के उज्जैन कुंभ में जूना अखाड़े ने माफी मांगने के बाद परिषद में दोबारा वापसी की। गोपाल गिरी ने आरोप लगाया कि इसके बाद अखाड़ा परिषद में नियमों की अनदेखी शुरू हुई और जूना अखाड़ा लंबे समय से परिषद के मंत्री पद पर बना हुआ है।


आवाहन अखाड़े के संदर्भ में उन्होंने कहा कि सत्य गिरी अखाड़े के महासचिव नहीं हैं, क्योंकि अखाड़े की नियमावली में महासचिव का कोई पद ही नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सत्य गिरी को केवल न्यायालय और सरकारी कार्यालयों में पैरवी के लिए मुख्तारनामा दिया गया है, इसलिए उन्हें महासचिव बताना भ्रामक है।


उन्होंने कहा कि वास्तविक अखाड़ा परिषद वही मानी जाएगी, जिसमें शंभू दल और रामा दल दोनों के प्रतिनिधि अध्यक्ष और महामंत्री के रूप में शामिल हों। उनका दावा है कि आवाहन अखाड़े के अधिकांश संत महानिर्वाणी अखाड़े के साथ हैं और उन्होंने स्वयं भी सैकड़ों साधुओं के साथ महानिर्वाणी अखाड़े के समर्थन की घोषणा की है।


हरि गिरी पर निशाना साधते हुए गोपाल गिरी ने कहा कि जिन संतों को पहले अखाड़ा परिषद से बहिष्कृत किया गया था, आज उन्हीं का समर्थन लिया जा रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि उस समय का बहिष्कार गलत था तो उसकी निष्पक्ष जांच क्यों नहीं कराई गई। उन्होंने यह भी कहा कि किसी एक अखाड़े को दूसरे अखाड़े की जांच करने का अधिकार नहीं है और ऐसा करने से समाज में अनावश्यक विवाद उत्पन्न होंगे तथा पुराने मामलों पर भी सवाल खड़े होंगे। यदि एक अखाड़ा दूसरे के यहां हस्तक्षेप करता है, तो पोल खुलने पर सबका भंडारा होना तय है।


अपने बयान में श्रीमहंत गोपाल गिरी ने कहा कि हरि गिरी द्वारा लगातार दिए जा रहे बयान “खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे” वाली कहावत को चरितार्थ करते हैं और इस प्रकार की बयानबाजी का कोई औचित्य नहीं है।

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