गणेश चतुर्थी : मूरत का नहीं, विकारों का विसर्जन

हिंदू धर्म में पूजा की शुरुआत गणेश जी से क्यों होती है? इसके पीछे एक कथा है। शिव-पार्वती ने कहा कि जो पूरी धरती का चक्कर लगाएगा, उसे सर्वश्रेष्ठ माना जाएगा और यह सुन कर कार्तिकेय चल पड़े। गणेश जी ने सोचा कि चूहे पर बैठकर मैं कैसे पूरी धरती पर चलूँगा? तब उन्होंने कहा कि मेरे माँ- पिता ही पूरी धरती के स्वामी हैं, मैं इन्हीं के चक्कर मार लूँ तो काम खत्म। उन्होंने वही किया। बेचारे कार्तिकेय चक्कर लगाते रहे।

नेचुरली, (स्वाभाविक है कि) कोई बच्चा अगर माँ-बाप को कह दे कि आप ही मेरे सब कुछ हो, तो हर माँ-बाप खुश हो जाएँगे। शिव -पार्वती भी खुश हो गए। गणपति को महादेव का आशीर्वाद मिला कि संसार में सबसे पहले तुम्हारी पूजा होगी, और गणेश जी विघ्नहर्ता हो गए। गणपति ने पार्वती माँ की मैल यानी मिट्टी से जन्म लिया था। विघ्न और मिट्टी यानी माया, दोनों आपस में जुड़े हुए हैं। फिर गणेश जी का विसर्जन हुआ, पर उनकी चेतना की शक्ति आज भी ब्रह्मांड में मौजूद है।

अब उस चेतना से कोई माया माँग ले या परमेश्वर। जिनको भी हम भगवान तुल्य रखते हैं, उनसे जब हम माया माँगते हैं तो वो देवी-देवता हो जाते हैं; और जब आत्म स्वरूप परमात्मा माँग लें, तो वो ब्रह्म हो जाते हैं। अब हमारे ऊपर है कि हम गणेश जी को देवता बना लें या परमेश्वर। गणेश जी विघ्नहर्ता हैं, पर क्या हमारे विघ्न खत्म हुए? आदमी मर जाता है, लेकिन उसके विघ्न खत्म नहीं होते। पर एक बफर सिस्टम ज़रूर मिल जाता है; कोई पंडित या ज्योतिषी रास्ता दिखा देता है कि कुछ उपाय कर लो, सब ठीक हो जाएगा। इससे तसल्ली हो जाती है। ये तब होता है जब हम देवी-देवता से कुछ माँगते हैं। ये जो माँग और आपूर्ति है, यही माया है।

अगर विघ्न से उठ जाना है, तो फिर विघ्न को स्वीकार कर लो जैसे हम सुबह, रात, गर्मी और ठंड को स्वीकार करते हैं। हमारा शरीर हमेशा स्वस्थ रहेगा, कमाई होगी, तालियाँ बजेंगी- ऐसा नहीं है; शरीर बीमार भी होगा, नुकसान भी होंगे और गालियाँ भी मिलेंगी। अपेक्षाएँ ही दुख का कारण हैं। गणेश जी से अगर हम माया मांगते हैं, तो वे संसार के विघ्नहर्ता हैं; और अगर उनको परमेश्वर की तरह देखना है, तो अपने विकारों का विसर्जन करना होगा। चतुर्थी यानी गणेश जी की पूजा जब शुरू हो, तो चाहे कितना भी समय लगे, उनमें प्राण प्रतिष्ठित करो यानी अपने विकारों को विसर्जित करो। गणेश जी से कहें कि कामवासना, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार – इन पाँच शैतानों को अपने साथ में ले जाओ। हमे अंदर से विरक्ति आ जाए, विकार बाहर आ जाएँ तो हम भी भगवान हो जाएँगे।

भगवान हमसे अलग थोड़े ही हैं। गणपति हमें बड़ा संदेश देना चाहते हैं कि मैं लड्डुओं का नहीं, बल्कि तुम्हारे विकारों का भोग लगाने आया हूँ। अपनी भक्ति को इतना प्रगाढ़ करो कि मैं तुम्हारे विकारों का भोग लगा सकूँ, ताकि तुम्हारा मन निर्मल हो जाए। इसलिए यह पर्व हमारी देह से नहीं, बल्कि हमारी अंतरात्मा और उस चेतन शक्ति से हो, जो परमेश्वर को पाने के लिए कई जन्मों से प्यासी है। प्राणों को एकाग्रचित्त करके जब हम खुद को परमात्मा की तरफ पूरी तरह न्योछावर, समर्पित कर देते हैं, तो उसी समय ब्रह्मांड से और गणपति से हमारा कनेक्शन जुड़ जाता है; तब अंदर के सारे विकार सूख जाएँगे और हम श्रृंगारित हो जायेंगे।

हमारे विकारों का विसर्जन ही हमारी मुक्ति है और यही हमारा शिव से मिलन है। हम उत्सव मनाते हैं और कहते हैं – “गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ।“ अगर भगवान का ही विसर्जन कर देंगे, तो क्या एक वर्ष तक हम विघ्नों में रहेंगे? और यदि उन्होंने सब विघ्न हर ही लिए तो अगले वर्ष उन्हें क्यों बुलाना? जिस दिन ब्रह्म या परमेश्वर हमारे जीवन में आ गये तो एक पल के लिए भी परमात्मा का विसर्जन नहीं होगा ,क्योंकि तब उनकी सूरत मन में बस जाती है। फिर मूरत का विसर्जन कर सकते हैं, पर सूरत का विसर्जन कभी नहीं होगा। भगवान हमारे लिए मूरत बनकर फिर से आ जाते हैं और विसर्जन होने को तैयार हो जाते हैं, ताकि शायद हमारी इन चमड़े की आँखों के पीछे हमारा तीसरा नेत्र यानी आत्म नेत्र खुल सके। ताकि गणपति के अंदर जो महादेव बसे हैं, वो भी हमें दिखाई दें। फिर हमें शमशान ना जाना पड़े और हम पारब्रह्म की यात्रा पर निकल जाएँ।

अगर हम मौत से पहले मर गए और शिव से मिलन हो गया, तो हम मुक्त हो जाएँगे। मरकर कोई मुक्त नहीं होता, मुक्ति जीते जी ही होती है। जीते जी मुक्ति का अर्थ है -जीते जी मर जाना, मरने से पहले ही मर जाना ताकि फिर हमें श्मशान न जाना पड़े; क्योंकि मौत तो शरीर की होती है, हमारी नहीं, और शरीर तो पहले से मरा हुआ ही है। मरने से पहले विकारों का मिटना ही मृत्यु है। उम्मीद करता हूँ कि इस बार गणेश पूजन से लेकर गणेश जी के विसर्जन तक हमारे विकारों का भी विसर्जन हो जाए, अंदर की वो ब्रह्म चेतना जाग उठे और हमारी यात्रा सफल हो।


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