“जो कल बनाया, आज तोड़ रहे, कुंभ से पहले हरिद्वार बना ‘डेवलपमेंट लैब’?”
हरिद्वार। कुंभ-2027 सिर पर है और हरिद्वार में विकास की रफ्तार देखकर ऐसा लगता है कि शहर को संवारने के साथ-साथ ‘बनाओ और फिर तोड़ो’ की नई परंपरा भी शुरू हो गई है। शहर की सड़कें, चौराहे और घाट विकास कार्यों की प्रयोगशाला बने हुए हैं। कहीं सड़क को नया रूप दिया जा रहा है तो कहीं कुछ समय पहले किए गए काम को ही बदलने या तोड़ने की नौबत आती दिखाई दे रही है। अब सवाल उठ रहा है कि क्या काम शुरू करने से पहले कोई होमवर्क भी होता है या फिर पहले टेंडर, फिर निर्माण और आखिर में जनता के सवालों के बाद सुधार?
साहब! नक्शे में सड़क चौड़ी थी, जमीन पर संकरी कैसे हो गई?
चौराहों के आसपास सड़क को संकरा किए जाने को लेकर स्थानीय लोगों ने सवाल उठाए। जनता का तर्क है कि जब पहले से ही यातायात का दबाव है, तो सड़क की उपयोगी चौड़ाई कम करने का फैसला आखिर किस आधार पर लिया गया? और जब सवाल उठे तो अब वही काम बदलने या हटाने की कवायद!
यानी जनता भी खुश, विभाग भी खुश
पहले काम करो, फिर जनता विरोध करे तो कह दो, चलो इसे भी बदल देते हैं! लेकिन असली सवाल है, इस पूरे प्रयोग का खर्च कौन उठाएगा?
जवाब शायद वही, जनता।
एसी कमरे में हरिद्वार बहुत सुंदर दिखता होगा!
हरिद्वार की सड़कें कागज पर देखकर शायद सब कुछ शानदार लगता हो। नक्शे में चौराहा व्यवस्थित, सड़क सुंदर और यातायात सुचारू दिखाई देता होगा। लेकिन जरा जमीन पर उतरकर देखिए साहब!
यहां सड़क पर रोज चलने वाला व्यक्ति जानता है कि कहां जाम लगता है, कहां वाहन फंसते हैं, कहां पैदल चलने वालों को परेशानी होती है और कहां थोड़ी सी जगह कम होने से पूरी व्यवस्था बिगड़ जाती है।
हरिद्वार को गूगल मैप से नहीं, हरिद्वार की जमीन पर चलने वालों से समझना होगा।
आम जनता से रायशुमारी कब होगी?
कुंभ-2027 के नाम पर बड़े-बड़े विकास कार्य हो रहे हैं। बैठकें भी हो रही हैं, योजनाएं भी बन रही हैं और करोड़ों रुपये के काम भी प्रस्तावित हैं। लेकिन सवाल यह है कि उस आम हरिद्वारवासी की राय कितनी ली जा रही है, जो रोज इस शहर की समस्याओं को झेलता है?
बैठकों में अधिकारी हों, जनप्रतिनिधि हों या विभिन्न संस्थाओं के लोगकृयह सब जरूरी है। लेकिन आम नागरिक की आवाज भी उतनी ही जरूरी है।
क्योंकि साहब,
जो व्यक्ति रोज जाम में फंसता है, उससे बेहतर ट्रैफिक की समस्या कौन बताएगा?
जो रोज घाट पर जाता है, उससे बेहतर घाट की जरूरत कौन समझेगा?
जो रोज उसी सड़क से गुजरता है, उससे बेहतर सड़क की वास्तविक स्थिति कौन बताएगा?
घाटों पर भी ‘नया मतलब नया’?
अब घाटों पर लगाए जा रहे पत्थरों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि जहां पहले से लगे पत्थर ठीक स्थिति में हैं, वहां भी उन्हें हटाकर नए पत्थर लगाए जा रहे हैं।
अगर पुराने पत्थर खराब हैं तो बदलना समझ में आता है।
लेकिन अगर सही हैं तो सवाल उठेगा ही
पुराना हटाकर नया लगाने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी?
क्या विकास का मतलब अब यह हो गया है कि जो ठीक है, उसे भी बदल दो ताकि नया काम दिखाई दे?
कुंभ से पहले हरिद्वार को चाहिए क्या?
हरिद्वार को सिर्फ चमकते चौराहे नहीं चाहिए।
शहर को चाहिए,
सुगम और पर्याप्त चौड़ी सड़कें
व्यवस्थित पार्किंग
बेहतर यातायात व्यवस्था
अतिक्रमण से राहत
साफ-सुथरे और सुरक्षित घाट
मजबूत एवं टिकाऊ निर्माण
श्रद्धालुओं के लिए बेहतर सुविधाएं
और सबसे जरूरी, ऐसी योजना जो कुंभ के बाद भी शहर के काम आए।
क्योंकि कुंभ खत्म होने के बाद कैमरे चले जाएंगे, श्रद्धालु लौट जाएंगे और अधिकारी भी अपनी अगली प्राथमिकताओं में लग जाएंगे।
लेकिन हरिद्वार तो यहीं रहेगा।
जनता पूछ रही है, विकास या ‘रीवर्क’?
विकास कार्यों पर सवाल उठाना विकास का विरोध नहीं है। सवाल सिर्फ इतना है कि जनता के पैसे से होने वाले काम सोच-समझकर किए जाएं।
पहले निर्माण
फिर आपत्ति
फिर तोड़फोड़
फिर नया निर्माण
अगर यही सिलसिला चलता रहा तो इसे विकास कहें या सरकारी ‘रीवर्क प्रोजेक्ट’ का मॉडल?
कुंभ-2027 हरिद्वार के लिए ऐतिहासिक अवसर है। यह शहर को स्थायी रूप से बेहतर बनाने का मौका है, न कि प्रयोग करके देखने का।
आखिर में बस एक सवाल
कुंभ के नाम पर हरिद्वार को ऐसा विकास चाहिए जिसे देखकर जनता कहे, वाह!
या ऐसा विकास
“पहले बनाया किसने था, और अब तोड़ कौन रहा है?”
जनता के पैसे का हिसाब होना चाहिए, योजनाओं की उपयोगिता पर सवाल होना चाहिए और सबसे बढ़कर काम शुरू होने से पहले जमीन की हकीकत समझी जानी चाहिए।
क्योंकि कुंभ आने वाला है, हरिद्वार कोई ‘ट्रायल रन’ नहीं है।


