श्रीमहंत के गजब कारनामे: बीबी वृंदावन में और मसूरी में शिक्षा ले रही औलाद, संत समाज में चर्चाओं का बाजार गर्म

हरिद्वार। सनातन परंपरा में संन्यास को त्याग, तपस्या और वैराग्य का सर्वोच्च मार्ग माना गया है। शास्त्रों में स्पष्ट रूप से वर्णित है कि संन्यास ग्रहण करने के बाद व्यक्ति को गृहस्थ जीवन, पारिवारिक संबंधों और सांसारिक मोह-माया से दूरी बनाकर रखनी चाहिए। लेकिन इन दिनों हरिद्वार के एक बड़े अखाड़े से जुड़े एक श्रीमहंत को लेकर ऐसी चर्चाएं सामने आ रही हैं, जिन्होंने संत समाज में हलचल पैदा कर दी है।

सूत्रों के अनुसार एक प्रतिष्ठित मठ के पीठाधीश्वर और एक बड़े अखाड़े से जुड़े श्रीमहंत का पारिवारिक जीवन होने की चर्चाएं लंबे समय से संतों और श्रद्धालुओं के बीच चर्चा का विषय बनी हुई हैं। बताया जा रहा है कि उनकी पत्नी धार्मिक नगरी वृंदावन में रहती हैं, जबकि उनके बच्चे भी हैं। इनमें से एक संतान उत्तराखंड के प्रसिद्ध पर्यटन एवं शैक्षणिक नगर मसूरी में शिक्षा ग्रहण कर रही है।

चर्चाओं के अनुसार संबंधित श्रीमहंत एक समृद्ध मठ के प्रमुख हैं और उनके पास संसाधनों की कोई कमी नहीं है। आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि मंदिर और मठ में आने वाले चढ़ावे तथा दान की राशि का उपयोग परिवार के भरण-पोषण और बच्चों की शिक्षा पर किया जा रहा है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन संत समाज के भीतर इस विषय को लेकर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं।

धार्मिक जानकारों का कहना है कि शास्त्रों में भगवान शिव को अर्पित दान और धार्मिक संस्थाओं की संपत्ति का उपयोग केवल धार्मिक, सामाजिक और लोककल्याणकारी कार्यों के लिए किए जाने का उल्लेख मिलता है। ऐसे में यदि किसी संन्यासी द्वारा निजी पारिवारिक आवश्यकताओं के लिए इन संसाधनों का उपयोग किया जाता है तो यह परंपराओं और मर्यादाओं के विपरीत माना जा सकता है।

इस पूरे मामले को उस समय और अधिक चर्चा मिली जब हाल ही में एक साध्वी का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। वीडियो में साध्वी ने संत समाज के कुछ लोगों के आचरण और चरित्र को लेकर गंभीर प्रश्न उठाए थे। इसके बाद से संबंधित श्रीमहंत का नाम भी चर्चाओं में आने लगा है।

सूत्रों का दावा है कि श्रीमहंत ने अब तक सार्वजनिक रूप से अपने परिवार की घोषणा नहीं की है। यही कारण है कि संत समाज के कुछ वर्गों में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग तेज हो रही है। एक साध्वी द्वारा आगामी कुंभ मेलों में संतों के “चरित्र सत्यापन” की मांग उठाए जाने के बाद यह मुद्दा और अधिक सुर्खियों में आ गया है।

वहीं संत समाज के कई वरिष्ठ संतों का मानना है कि यदि कोई व्यक्ति संन्यास की परंपरा का पालन नहीं कर रहा है तो उसे सार्वजनिक रूप से अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि धार्मिक संस्थाओं और संत परंपरा की गरिमा पर प्रश्नचिह्न न लगे। दूसरी ओर कुछ संत इस विषय पर खुलकर बोलने से बच रहे हैं।

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