‘अगर अब भी खुद को श्री महंत मानते हैं तो अखाड़े में क्यों नहीं रहते
त्रयंबकेश्वर के निजी फार्म हाउस में रहने पर भी श्रीमहंत ने उठाए सवाल
श्रीमहंत दुर्गा दास की दो टूक, दूसरे अखाड़े हमारे मामलों में न झांकें’
हरिद्वार। श्री पंचायती अखाड़ा बड़ा उदासीन के श्री महंत दुर्गा दास ने अखाड़े से निष्कासित महंत रघु मुनि को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया कि अखाड़े से निष्कासन के करीब तीन वर्ष बीत जाने के बावजूद रघु मुनि कथित तौर पर अखाड़े के नाम और पद का उपयोग कर रहे हैं, जिसे अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। श्री महंत दुर्गा दास के अनुसार, अखाड़े की परंपरा, नियमों और कानूनों के विपरीत अमर्यादित आचरण तथा अखाड़े को कथित रूप से आर्थिक क्षति पहुंचाने के गंभीर मामलों के चलते रघु मुनि और महंत अग्रदास का पूर्व में निष्कासन किया जा चुका है। उनका कहना है कि निष्कासन के बाद नियमों के तहत उनके पास अपने नाम के साथ ‘बड़ा उदासीन अखाड़ा’ या किसी पद का उल्लेख करने का अधिकार नहीं रह जाता।
खुद को श्री महंत मानते हैं तो अखाड़े में क्यों नहीं रहते?
श्री महंत दुर्गा दास ने रघु मुनि के त्रयंबकेश्वर स्थित निजी फार्म हाउस में रहने को लेकर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि यदि रघु मुनि स्वयं को अब भी अखाड़े का श्री महंत मानते हैं, तो उन्हें अखाड़े के परिसर में रहना चाहिए। उनका आरोप है कि पिछले तीन वर्षों से निजी फार्म हाउस में रहना अखाड़े की व्यवस्था और नियमों के अनुरूप नहीं है।
सिंहस्थ कुंभ की तैयारियों पर बोले, पूरी गति से चल रहा काम
आगामी सिंहस्थ कुंभ मेले को लेकर श्री महंत दुर्गा दास ने कहा कि अखाड़े में तैयारियां पूरी गति से चल रही हैं। अखाड़े की गरिमा, मर्यादा और परंपराओं के अनुरूप कुंभ को दिव्य और भव्य बनाने के लिए संत समाज पूरी निष्ठा के साथ जुटा हुआ है।
अखाड़ा परिषद विवाद पर भी दो टूक
अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष पद को लेकर चल रहे विवाद और विभिन्न अखाड़ों के बीच जारी बयानबाजी पर श्री महंत दुर्गा दास ने कहा कि प्रत्येक अखाड़े की अपनी स्वतंत्र व्यवस्था, आराध्य देवता, पूजा पद्धति, साधना पद्धति और आंतरिक नियम होते हैं। उनका कहना है कि इन नियमों का उल्लंघन होने पर संबंधित अखाड़ा अपने स्तर पर नियमानुसार कार्रवाई करता है। उन्होंने अन्य अखाड़ों को नसीहत देते हुए कहा कि किसी भी अखाड़े को दूसरे अखाड़े के आंतरिक और निजी मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि बेहतर यही होगा कि सभी अखाड़े अपनी-अपनी परंपरा और व्यवस्था का सम्मान करें तथा दूसरे अखाड़ों के आंतरिक मामलों में दखल देने से बचें।


