भगवा संत समाज में बढ़ती उपाधियों की होड़ ने खड़े किए गंभीर सवाल
हरिद्वार। कभी भगवा पहनना संसार से मोह छोड़ने की निशानी माना जाता था। अब सवाल उठ रहा है कि क्या वही भगवा धीरे-धीरे पद, प्रतिष्ठा और उपाधियों की सीढ़ी बनता जा रहा है? संत समाज का एक वर्ग यदि त्याग की बात करते-करते पद की दौड़ में शामिल नजर आए, तो सवाल सिर्फ किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरी संत परंपरा की साख का है।
सबसे दिलचस्प तस्वीर तब सामने आती है, जब एक ही व्यक्ति की पहचान समय के साथ साधु से महामंडलेश्वर और फिर जगद्गुरु जैसी अलग-अलग उपाधियों तक पहुंचती दिखाई देती है। इसके साथ ही हरिद्वार में महामंडलेश्वर और जगद्गुरु दोनों पदवी का एक साथ इस्तेमाल किया जा रहा है। बावजूद इसके धर्म धुरंधर इस ओर आँखें मूंद बैठे हैं। सवाल सीधा है—उपाधियां इतनी आसानी से बदल रही हैं या संत समाज की परिभाषा ही बदल गई है?
जिस समाज से लोगों को मोह-माया त्यागने की सीख मिलती है, उसी समाज में पद और प्रतिष्ठा की यह दौड़ आखिर किस दिशा का संकेत है? यदि संत की पहचान उसके तप, त्याग और आचरण से होनी चाहिए, तो फिर उपाधियों की लंबी सूची किस चीज का प्रमाण है? यही सवाल अब आमजन के भीतर और बाहर चर्चा का विषय बन रहा है।
समाज को दिशा कौन देगा?
सबसे बड़ा सवाल संत समाज के सामने है। जो स्वयं पद और प्रतिष्ठा के पीछे दौड़ता दिखाई दे, वह समाज को त्याग और वैराग्य का रास्ता किस तरह दिखाएगा? संत की ताकत उसके पद में नहीं, उसके तप, त्याग, आचरण और समाज के प्रति सेवा में होनी चाहिए।
त्याग का चोला पहनकर पद की दौड़ में शामिल होने वालों से यह सवाल पूछना जरूरी है। आखिर समाज को वैराग्य का पाठ पढ़ाने वाले स्वयं पद-मोह से कब मुक्त होंगे?


