मदर्स डे : शरीर की माँ के प्रति आदर और परम माँ की खोज

‘माँ’ शब्द कहते ही संसार में हमें जन्म देने वाली, पालन-पोषण करने वाली माँ का चेहरा सामने आ जाता है। और एक माँ है जिसको हम कहते हैं, जगत-जननी माँ जिसने सब को जन्म दिया। जन्म देने वाली माँ अगर नहीं होती, तो तुम भी नहीं होते; तुम हो, तो जीवन का आज उद्धार हो सकता है। कभी तुम जानवरों, पंछियों, कीड़े-मकोड़ों, पेड़-पहाड़ों की योनियों में भटके; तब तुम जगत-जननी माँ से मिल नहीं सके। पर इस देह में, क्योंकि विवेक और बुद्धि हैं, तुम मिल सकते हो।

प्रकृति के पाँच तत्वों का पुतला सिर्फ मनुष्य देह है। पूरी की पूरी प्रकृति, आकाश, पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, यह पाँचों तत्व, यानी पूरी जगत-जननी तुम में समाई है। जिस माँ और पिता की तुम संसार में बात करते हो, उस परम पिता पुरुष और उस जगत-जननी माँ दोनों के योग से तुम संसार में प्रकट हुए। इस मनुष्य देह में तुम्हारा एक ही उद्देश्य है, उस जगत-जननी और परम पिता को पाना। अगर इस खेल में तुम चूक गए, तो खेल सारा का सारा खराब हो जाएगा। बुद्ध, महावीर, जीसस, गुरु नानक, राम-परमहंस, साईं-बाबा, मीरा बाई, सहजो बाई, लल्ला बाई, कबीर, फरीद, इन सबने परम माँ और परम पिता को पाया। इस संसार के अंदर तुम्हारे माता-पिता, जिन्होंने तुम्हें मौका दिया जगत-जननी और परम पिता से मिलने का, उनको तुम्हें नमस्कार करना चाहिए। अगर तुमने संसार की माता का ही सम्मान नहीं किया, तो तुम जगत-जननी का सम्मान कैसे कर पाओगे? उस जगत-जननी को कैसे पा सकते हैं? वह मिलता ही तब है, जब तुम पूर्ण प्रेम हो जाते हो। जिसने अपने संसार के माता-पिता को प्रेम किया, वही जगत-जननी और परम पिता को पाने का अधिकारी हो सकता है।

संसार के अंदर तुमने सदा माँ को सबसे ऊँचा दर्जा दिया, पर कोई माँ का उतना सम्मान नहीं करता, क्योंकि सब सम्बंध कहीं-न-कहीं, कुछ-न-कुछ लेन-देन पर खड़े हैं। बच्चे माँ बाप से उम्मीद करते हैं; अगर न मिले तो कहते हैं—प्यार कैसा? क्योंकि सच तो यह है कि प्यार क्या है, यह पता ही नहीं है। अगर प्यार का अर्थ पता हो, तभी माता-पिता को प्यार किया जा सकता है। सारे संसार का सम्बंध ही खोखला हो गया, तभी मैंने कहा कोई किसी को संसार में प्यार नहीं करता। जब कोई प्यार की भाषा सीख जाता है, तो वह स्वयं प्यार हो जाता है। और ऐसा ही जन कोई संसार की माता, संसार के पिता को प्यार कर पाता है, और वह कोई करोड़ में एक होता है।

तुम अपने अंदर झाँक कर देखो कि तुम अपने माता-पिता को कितना प्यार करते हो। तुम्हें श्रवण कुमार बनना है, श्रवण का अर्थ होता है जिस ने सुन लिया, जो जाग गया, यानी तुम उनको माथे पर ही रखो, तुम सिर्फ प्रेम करो। माता-पिता जैसे भी हैं तुम्हारे, तुमको संसार में लाने वाले हैं। यदि न मिलते तो शायद तुम चौरासी लाख योनियों में ही पड़े रह जाते। अब आ ही गए हो संसार में तो, तुम्हें मुक्त होना है। इसलिए पहले संसार की माँ को प्रणाम, पिता को प्रणाम। तुम्हें अपना कर्म और अपना धर्म निभाना है। कर्म यानी बाहर संसार और धर्म मतलब उस जगत पिता, जगत माता से मिलने का तुमको कर्म करना है। जब तक तुम धर्म को आगे नहीं रखोगे, तुम्हारे संसार के सारे कर्म भी बद्कर्म होंगे। इसलिए पहले जगत माता और जगत पिता को आगे लाओ।

जब तक तुम जगत माता और परम पिता को आगे नहीं लाओगे, तुम संसार के अपने माता-पिता को प्रेम नहीं कर पाओगे। और मात-पिता को प्रेम तभी कर सकते हो, जब तुम जगत माँ और परमपिता को प्रेम कर सको क्योंकि तब तुम बनोगे श्रावक। तभी तुम्हें मिलेगा जीवन का ज्ञान। सत्य के मार्ग पर संसार के माता-पिता की सेवा करो। बाहर से सेवा करो, और भीतर से तुम्हें अपने परम की, अपने जगत-माता, जगत-पिता की सेवा करनी पड़ेगी। तभी जीवन परम जीवन को मिलेगा और तुम्हारी यात्रा सफल होगी।


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