त्याग से तख्त तक: क्या बदल गई संत समाज की परंपरा?
हरिद्वार। सनातन धर्म की पहचान त्याग, तप, सेवा और लोककल्याण से रही है। ऋषि-मुनियों और संतों की परंपरा ने सदियों तक समाज को सत्य, करुणा और धर्म का मार्ग दिखाया। लेकिन आज धर्मनगरी हरिद्वार सहित देश के कई धार्मिक केंद्रों में जो तस्वीर उभर रही है, उसने श्रद्धालुओं के मन में गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या भगवा वस्त्र अब त्याग का प्रतीक कम और प्रभाव, प्रतिष्ठा तथा सत्ता का माध्यम अधिक बनते जा रहे हैं? क्या धर्म की रक्षा के नाम पर कुछ लोग केवल अपना वर्चस्व कायम रखने की राजनीति कर रहे हैं? क्या अखाड़ों, आश्रमों और धार्मिक संस्थाओं में आध्यात्मिक योग्यता से अधिक महत्व गुटबाजी और शक्ति संतुलन का हो गया है? ऐसा नजर आ रहा है। क्योंकि आज अपात्र को भी धनबल के चलते प्रतिष्ठित पदों पर आसीन किया जा रहा है। जगद्गुरु और शंकराचार्य जैसे पद आज कोई मायने कुछ भगवाधारियों के कारण नहीं रह गये हैं।
यह सवाल पर इसलिए भी जरूरी हो गएं है क्योंकि आगामी वर्षों में हरिद्वार, नासिक और उज्जैन जैसे प्रमुख तीर्थों में कुंभ जैसे विश्व के सबसे बड़े आध्यात्मिक आयोजन होने हैं। करोड़ों श्रद्धालु संत समाज को आदर्श मानकर वहां पहुंचेंगे। ऐसे में यदि संत समाज के भीतर ही विवाद, जोड़-तोड़ और पदों की राजनीति सुर्खियां बनेगी तो इसका सीधा असर सनातन धर्म की प्रतिष्ठा पर पड़ेगा।
धार्मिक परंपरा कहती है कि संन्यास का अर्थ है मोह, माया, पद और प्रतिष्ठा का त्याग। लेकिन यदि किसी पद को बचाने या पाने के लिए मित्र और शत्रु रातोंरात बदल जाएं, बयान बदल जाएं और सिद्धांत भी परिस्थितियों के अनुसार बदलने लगें, तो यह केवल व्यक्ति का नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था का संकट बन जाता है।
सबसे गंभीर चिंता धार्मिक पदों की गरिमा को लेकर है। वर्षों से समय-समय पर ऐसे आरोप सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा रहे हैं कि कुछ धार्मिक उपाधियों और पदों के चयन में पारदर्शिता का अभाव है या फिर धनबल के आगे सिद्धांतों को तिलांजलि दे दी गई। इन आरोपों की पुष्टि संबंधित संस्थाओं द्वारा स्वीकार नहीं की गई है। यदि समाज में इस प्रकार की धारणाएं लगातार बन रही हैं तो उनका समाधान भी आवश्यक है। धर्म की प्रतिष्ठा केवल परंपरा से नहीं, बल्कि पारदर्शिता और नैतिक आचरण से भी कायम रहती है।
विडंबना यह है कि समाज में बढ़ती नशाखोरी, धर्मांतरण, सांस्कृतिक चुनौतियां, युवाओं में नैतिक मूल्यों का ह्रास और परिवार व्यवस्था के संकट जैसे अनेक विषय हैं, जिन पर संत समाज की मुखर और संगठित भूमिका अपेक्षित है। लेकिन इन विषयों की तुलना में यदि अधिक ऊर्जा आंतरिक विवादों, पदों की खींचतान और गुटीय राजनीति में खर्च होती दिखाई दे, तो सनातनी जनता का निराश होना स्वाभाविक है।
आज आवश्यकता किसी संत विशेष को कठघरे में खड़ा करने की नहीं, बल्कि आत्ममंथन की है। संत समाज जितना बड़ा होगा, उसकी जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी होगी। समाज संतों से राजनीति नहीं, मार्गदर्शन चाहता है, संघर्ष नहीं, समरसता चाहता है, पद की दौड़ नहीं, त्याग का उदाहरण चाहता है।
सनातन धर्म हजारों वर्षों से इसलिए जीवित है क्योंकि उसकी शक्ति किसी व्यक्ति या पद में नहीं, बल्कि उसके सिद्धांतों में है। यदि सिद्धांत कमजोर होंगे तो पद भी सम्मान नहीं बचा पाएंगे। लेकिन यदि त्याग, सत्य और सेवा की परंपरा मजबूत रहेगी तो कोई भी चुनौती सनातन की जड़ों को नहीं हिला सकेगी।
समय आ गया है कि संत समाज स्वयं तय करे—उसे इतिहास में त्याग की परंपरा का वाहक बनकर याद किया जाएगा या फिर पद और प्रतिष्ठा की राजनीति में उलझे एक ऐसे दौर के रूप में, जिसने सनातनी जनता के विश्वास को सबसे अधिक चोट पहुंचाई। क्योंकि धर्म केवल उपदेशों से नहीं, बल्कि आचरण से जीवित रहता है।
आजकल कुछ कथित भगवाधारी शौक पूरा करने के लिए परंपराओं और आदर्शों को तिलांजलि दे बैठे हैं। जबकि यह याद रखना चाहिए कि शौक में ही शोक छिपा रहता है।


