गुरु पूर्णिमा: संसार में रहते हुए मुक्ति का महापर्व

बुधवार को गुरु पूर्णिमा है। क्या गुरु पूर्णिमा के दिन हम सचमुच खुश हैं? गुरु खुशियाँ देता है, पर सतगुरु आनंद देता है। सच्चिदानंद -सत्, चित्, आनंद हमने किसको कहा- ईश्वर को, भगवान को, यानी जो आनंद में आ गया, वो भगवान हो गया। ये भगवान की परिभाषा है। गुरु पूर्णिमा के दिन तुम्हें अपने अस्तित्व को समझना बहुत ही जरूरी है।

कोई भी उत्सव एक महान संदेश लेकर आता है, खासकर जब वो अध्यात्म यानी परमात्मा से जुड़ा हो। अगर हम सोचें कि आज गुरु का सम्मान कर दिया तो गुरु पूर्णिमा हो गई, ये बहुत बड़ी चूक होगी। अगर जीवन में तुमने अभी तक पूर्णता को नहीं पाया है, तो तुम असफल हो। गुरु पूर्णिमा! गुरु शुरुआत है और पूर्णता है अंत। “पूर्ण गुरु भेटिया”, पूर्ण गुरु किसे मिलता है? पूर्ण गुरु तभी मिलता है जब अहंकार मिटता है। जब ‘मेरा’ और ‘मैं’ मिटता है, तब पूर्ण गुरु मिलता है।

जब कोई शिष्य पूर्ण हो जाता है, तो वह पूर्ण गुरु को संसार में प्रकट करता है। यानी पूर्ण शिष्य ही पूर्ण गुरु को संसार में प्रकट करता है। पूर्ण गुरु तुम्हारे को अपनी ज्योत से जलाने के लिए संसार में आता है। पूर्ण शिष्य, पूर्णिमा और पूर्ण गुरु असल में कौन है? ‘गीता’ कह रही है कि पूर्ण शिष्य ही पूर्ण गुरु को प्रकट करता है।

‘गुरु ग्रंथ साहिब’ कह रहे हैं कि किसी तत्वज्ञानी गुरु के पास जाकर ज्ञान लियो, तत्वज्ञानी कौन? पूर्ण गुरु कौन? हमें पूर्ण गुरु का कैसे पता लगेगा? देखो, पूर्ण गुरु जो कहता है, वो खुद भी वैसा होना चाहिए, जिसके अंदर संसार की कोई इच्छा ना रह जाए, जिसके जीवन में सुख-दुख, लाभ-हानि, मान-अपमान, जन्म-मृत्यु सब एक समान हो जाए। जीवन में कोई पूर्ण गुरु प्रकट हो, यानी “मैं और तू” एक हो जाएँ, तो उसे पाने के लिए प्यास होनी चाहिए। जिंदा, जिंदाओं की ओर भागते हैं। जिंदा क्या है? अंदर की प्यास, चेतना और ज्योत।

पूर्ण गुरु को वही खोजता है, जो ज्योतिर्मय होना चाहता है। जो इस मरे हुए शरीर और मरे हुए पदार्थों को दूर से बोध कर लेता है कि यहाँ पर सब मरने वाला है, और अगर आज मैं मर गया तो क्या होगा? तब उसके अंदर एक पागलपन, एक दीवानगी आती है, कि मुझे इस मरे हुए संसार और मुर्दा शरीर से बाहर निकलना है। मुक्ति! पूर्ण गुरु मुक्ति देता है। “पूर्ण गुरु भेटिया पूर्ण हुई युक्त, खिलंदियाँ, हसंदियाँ, खावंदियाँ, विचों होए मुक्त”। केवल गुरु कोई मायने नहीं रखता। हज़ारों – लाखों, गुरुओं की भीड़ है, पर पूर्ण गुरु महत्वपूर्ण है। और पूर्ण गुरु उसी को मिलेगा, जो पूर्ण शिष्य होना चाहेगा; जो पूर्ण शिष्य ही नहीं होना चाहता, उसे पूर्ण गुरु की ज़रूरत ही क्या है? अगर पूर्ण गुरु चाहिए, तो पूर्ण शिष्य होने की पात्रता भी होनी चाहिए। पहले अंदर भूख होनी चाहिए।


अगर मुझे रोटी की भूख ही नहीं है, तो मैं रोटी क्यों ढूँढूँगा? पानी की प्यास ही नहीं है, तो पानी क्यों ढूँढूँगा? मुझे भूख तो होनी चाहिए ना कि ये पूर्ण गुरु क्या है? गुरु पूर्णिमा क्या है? पूर्णिमा, पूर्णता से बनी है। जब कोई गुरु संसार में प्रकट हुआ, उस दिन हुई गुरु पूर्णिमा। इसलिए गुरु पूर्णिमा कोई छोटा-मोटा उत्सव नहीं है। तीन सौ पैंसठ दिन में ये सबसे विराट उत्सव है। इसलिए कहा गया है कि भगवता को पाओ। “पूर्ण गुरु भेटिया पूर्ण हुई युक्त,खिलंदियाँ, हसंदियाँ, खावंदियाँ, विच्चों होए मुक्त”।

गुरु नानकदेव ने ये क्या कहा है? उन्होंने कहा, कि भाई कुछ छोड़ना नहीं है, ये नहीं कि मुक्ति के लिए खाना छोड़ना है, रहना छोड़ना है, घूमना छोड़ना है; मुक्ति के लिए केवल अपनी ‘मैं’ को छोड़ना है। ये कैसे छूटेगी? ‘मैं’ को मिटाने वाला कोई आए, यानी ‘तू’ आए तो ‘मैं’ मिटे, और उस ‘तू’ को ही पूर्ण गुरु कहा है। पूर्ण गुरु मतलब जो तुम्हारी ‘मैं’ को निगल जाता है। अंत:करण में अगर पूर्ण गुरु को पाने की और प्रकट करने की तैयारी है, तो फिर आज ये दृढ़संकल्प करो कि मुझे “पूर्ण गुरु को प्रकट करना ही है”। फिर तुम्हारी खुशहाल ही नहीं, आनंदमय गुरु पूर्णिमा होगी। संसार भी तुम्हारी ओर देखेगा। तुम्हारे द्वारा संसार पूर्ण गुरु को देखेगा और तभी ये जन्म सफल होगा। “हैपी गुरु पूर्णिमा!”

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