आज हिन्दू त्योहारों की स्थिति देखकर ह्रदय व्यथित ही नहीं भविष्य की कल्पना से भी शशंकित व कंम्पायमान है। धर्म के नाम पर सियासत करने और अपनी रोटियां सेकने वालों का सनातन धर्म से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं, वह महज चंद मजहबी नारों तक सीमित हैं। मैं विनम्रतापूर्वक आज सनातन धर्म के ठेकेदारों से पूछना चाहता हूं कि कितने हिन्दुओं के बच्चे गायत्री मंत्र जानते हैं? कितने शिखा बंधन करते हैं? कितनांे के परिजनों ने उनका यज्ञोवीत करवाकर उन्हें यज्ञोपवीत कि महत्ता बताई है? कितने लोग सूर्योपासना व सूर्य को अर्क देते हैं? अपने बुजुर्गों के चरण छूना तो दूर उन्हंे कितने लोग सम्मान देते हैं?
गुस्ताखी माफ करें आज मुस्लिम सम्प्रदाय का बच्चा मदरसे में जाता है उसे पहले कुरान की आयतें याद करवाई जाती हैं। उनके संस्कार ही इतने सशक्त किए जाते हैं कि उन्हें मजहबी उन्माद से सरोबार किया जा रहा हैं।
त्यौहार तो अन्य धर्मों के लोग भी मानते हैं और हमारे से ज्यादा आस्था से मनाते हैं परंतु वह कभी भी करोड़ों रुपए की आतिशबाजी जैसी फिजूलखर्ची कर त्यौहार नहीं मानते।
दीपावली पर आतिशबाजी पर करोड़ों रुपए स्वाहा कर उपहारों पर बेतहाशा पैसा करने वाले मेरे सनातनी भाई क्या कभी किसी गरीब की झोपड़ी में भी गए हैं, जहां दो वक्त की रुखी सूखी रोटी भी मयस्सर नहीं है। इनकी सूनी और वीरान पड़ी झुग्गी-झोपड़ी में एक दिया भी रोशन करने वाला कोई नहीं। वह तो सियासतदानों की वोट बैंक है, उन्हें मदिरा बांटकर चुनावों में उनका प्रयोग किया जाता है। मेरे ख्याल से अन्य मजहबों में यह सब दिखावा नहीं है। वहाँ तो गरीबी के बाद भी कौमी एकता बरकरार हैं। इस हालात पर मुझे स्व. साहिर लुधियानवी सहाब का एक शेर याद आ रहा है, यदि आप कुछ समझ सके तो मैं वह चार पंक्तियां जो हमेशा मेरे जेहन में उठती हैं।
देखा है जिंदगी को कुछ इतने करीब से, चेहरे तमाम लगने लगे हैं अजीब से।
ऐ रूह-ए-अस्र जाग कहां सो रही है तू, आवाज दे रहे हैं पयम्बर सलीब से।।
इस रेंगती हयात का कब तक उठाएं बार, बीमार अब उलझने लगे हैं तबीब से।
हर गाम पर है मजमा-ए-उश्शाक मुंतजिर मक्तल की राह मिलती है कू-ए-हबीब से।।
इस तरह जिंदगी ने दिया है हमारा साथ जैसे कोई निबाह रहा हो रकीब से।
सनातन धर्म को रसातल में ले जाने में हमारे कुछ मठाधीश, धर्माचार्य, धर्म ध्वजवाहक व फेसबुक गुरु, व्हाट्सएप गुरू भी पूरी तरह उत्तरदायी हैं। धर्म के आढत की बड़ी-बड़ी अहालीलिकाओं में दुकानें खोलकर धर्म के नाम पर चंदे के गोरखधंधे चला रखे हैं। इस विषय पर में विस्तार से नहीं जाना चाहता, क्योंकि लंबे-लंबे तिलकधारी यह आडम्बरी और इनके धर्म के नाम पर बने ऐशगाह स्थल की गुजरियां हमारे विश्व के सबसे प्राचीन और दुनिया में अत्यंत सम्मान से देखे जाने वाले सनातन धर्म को दीमक की तरह चाट रहे हैं।
इन तथाकथित धर्माचार्यों के पास मनन, चिंतन, जप, तप और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए समय नहीं है, यह तो बड़े-बड़े राजनेताओं, भ्रष्ट मंत्री, संतरियों की चाकरी और उनके साथ फोटो खिंचवाकर अपने उन अनुयायियों से अनुष्ठानों के नाम पर मोटी वसूली करते हैं, जो सोचते हैं इन पाखंडियों के चरण पखारने से उनके पाप धुल जाएंगे। वो मुगालते में हैं। कर्म का फल खुद ही भोगना हैं। मेरा राजनैतिक दलों से विनम्र निवेदन और सलाह है कि वह तुष्टीकरण ना बनाएं क्योंकि इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं हैं ।
ना अब तो संत रहे, ना वो भक्त मुझे, याद है जब मेरे ब्रह्मलीन आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी लोकेशानन्द गिरि ने पारद शिवलिंग के उद्घाटन पर भारत सरकार के स्व. राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह उनके आश्रम में पधारे तो मैं स्वयं अपने ब्रह्मलीन गुरु जी के साथ था। मेरे समक्ष ही तत्कालीन स्वर्गीय राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह गुरु महाराज के चरणों में दण्डवत लेट गए और चरण वंदना की। यह मेरे गुरुदेव के ताप का प्रभाव था।
दूसरी एक और घटना मुझे याद आती है, जब तत्कालीन राष्ट्रपति स्व. एपीजे अब्दुल कलाम हरिद्वार में भेल के कन्वेंशन हॉल में आए। हालांकि वह दक्षिण भारत के मुस्लिम थे, परंतु हिन्दी ना जानते हुए भी उन्हें हिन्दू सनातनी वेदों, उपनिषदों और पुराणों के संस्कृत श्लोक सुनना बहुत प्रिय था। वहां गिने चुने ही मीडिया कर्मी भी उपस्थित थे, जिनमें मैं भी स्वयं कन्वेंशन हॉल में मीडिया की पंक्ति में बैठा था।
तब हरिद्वार के एक बड़े रसूखदार सियासती संत अपने कुछ कुछ श्रीमहंतांे व उनके यहां वेद विद्यालय के विद्यार्थियों के साथ उपस्थित थे। विद्यार्थियों ने बहुत ही मधुर गान में संस्कृत में कलाम साहब के स्वागत में स्वस्तिवाचन पाठ किया था। चूंकि तत्कालीन राष्ट्रपति संस्कृत व हिन्दी बहुत कम बोल पाते थे। फिर भी वह विद्यार्थियों के स्वस्तिवाचन से गदगद हो गए, तो उन्होंने उन श्रीमहंत जी से भी कोई संस्कृत का श्लोक सुनाने का आग्रह किया। तब श्रीमहंत जी बगले झांकने लगे और एक दो लाइन का रटा रटाया श्लोक सुन कर अपनी शर्मिंदगी को बचाया।
इस प्रकरण को लिखने का मेरा मकसद सिर्फ यह है कि हर चमकने वाली वस्तु सोना नहीं होती। धर्म के में ठेकेदारों के बाहरी आवरण को नहीं उनकी हकीकत को देखें तपस्वी तो हिमालय की कन्दराआंे में है उन्हें फाइव स्टार सुविधाओं से भी बेहतर आश्रमों की लग्जरी सुविधाओं से कोई व्यवस्था नहीं।
सनातन धर्म को बचाने और पुनः उसे उसके गौरवशाली शिखर पर ले जाने के लिए संत, महंत, महामण्डलेश्वरों, धर्माचार्यों को सियासतदानों की चाकरी छोड़कर अपने अस्तित्व को पहचानना होगा। युवा पीढ़ी को संस्कार देने होंगे। राजनेताओं के मात्र जय श्री राम के नारे को नार न बनाकर रघुकुल भूषण मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के आदर्श, त्याग और उनकी उन मर्यादाओं को भी जन जागरण में शामिल करना होगा, जिस प्रभु श्री राम ने निषाद, भील, साबरी, जैसांे को गले लगाया कोई जात-पात नहीं देखी प्रेम में सभी के झूठे बेर भी प्रेम से खाये।
श्री राम तो करुणा के सागर थे। उन्होंने वन जातियों वानर वानर और भालूओं को भी गले लगाया। कुछ संतों से मैंने सुना की युवा पीढ़ी को मोबाइल फोन ने बर्बाद कर दिया है। यह बात किसी हद तक ठीक है। लेकिन साम्मानीय धर्म, घ्वजवाहकांे मोबाइल तो मुस्लिमों, ईसाइयों और फिरंगियों के पास भी है, परन्तु उन्हें इस कदर फना होते नहीं देखा। महाराज जी हकीकत है बेरोजगारी। शिक्षित युवक भ्रष्ट राजनीतिज्ञों के पिछलग्गू बनकर उनके राजनैतिक संरक्षण में पैसे कमाने और एबब्यसन के लिए गैरकानूनी धन्धों और जुर्म की दुनिया में शुमार हो रहे हैं।
अभी भी वक्त है सियासतदानों और धर्माचार्यों युवा पीढी और डूबने के कगार पर खड़े धर्म को बचाओ। माया के भ्रम में ना पडो वह श्रणिक और चंचल हैं। लक्ष्मी को चंचल और चला चलायामान कहा गया है वह स्थिर नहीं दुनिया लूटकर खघ्जाने भरने वाला सिकन्दर भी दोनों खाली हाथ पसरकर दुनिया से रूसखत हुआ था। वैसे कंचन कामिनी की चकाचौंध से बचकर सत्य व् धर्म के मार्ग पर चलना इस भौतिकवादी युग में तलवार की धार पर चलने जैसा हैं।
डा. रमेश खन्ना


