हरिद्वार। हाल ही में पिता बने एक प्रमुख अखाड़े के आचार्य महामण्डलेश्वर को लेकर संत समाज में चर्चाओं का दौर लगातार जारी है। अब चर्चा इस बात की है कि चातुर्मास की समाप्ति के बाद आचार्य महामण्डलेश्वर अपने पुत्र के दर्शन के लिए जाएंगे। हालांकि कुछ संतों का मानना है कि यदि परिस्थितियां अनुकूल रहीं तो गुरुपूर्णिमा के अवसर पर ही पुत्र अपनी मां के साथ दर्शन दे सकता है, जिससे लंबे समय से चल रही उत्सुकता पर विराम लग सकता है।
सनातन परंपरा के अनुसार चातुर्मास के दौरान साधु-संत भ्रमण नहीं करते और एक ही स्थान पर रहकर साधना, जप-तप एवं धार्मिक अनुष्ठानों में समय व्यतीत करते हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि आचार्य महामण्डलेश्वर भी परंपरा का पालन करते हुए चातुर्मास पूरा होने के बाद ही अपने पुत्र से मिलने जाएंगे।
आचार्य महामण्डलेश्वर के पिता बनने की खबर सामने आने के बाद से संत समाज में इसे लेकर खूब चर्चाएं होती रही हैं। कई संत अपने भतीजे और भाभी के दर्शन की इच्छा जताते रहे, लेकिन अब तक किसी की यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी। इतना ही नहीं, संतों के बीच पुत्र के नामकरण और परिवार से जुड़ी अन्य बातों को लेकर भी तरह-तरह की चर्चाएं होती रहीं।
अब सूत्रों के हवाले से चर्चा है कि चातुर्मास समाप्त होते ही आचार्य महामण्डलेश्वर पुत्र दर्शन के लिए जा सकते हैं। वहीं कुछ सूत्रों का दावा है कि गुरुपूर्णिमा के अवसर पर ही पुत्र अपनी मां के साथ दर्शन दे सकता है। यदि ऐसा होता है तो आचार्य महामण्डलेश्वर को चातुर्मास समाप्त होने का इंतजार भी नहीं करना पड़ेगा और संत समाज की लंबे समय से चली आ रही उत्सुकता भी समाप्त हो जाएगी। किन्तु इसमें संतों को भाभी और भतीजे को पहचानना स्वंय होगा। भतीजे और भाभी के दर्शन करने के बाद हो सकता है कि संत छोरा गंगा किनारे वाला गाने गाते हुए डांस करने लग जाएं।


