जमीन पर कथित कब्जे की कोशिश, सहयोग नहीं मिला तो वरिष्ठ अधिकारी के तबादले की गुहार, सत्ता के दरबार तक पहुंची शिकायत
हरिद्वार। तीर्थनगरी में भगवा चोले की आड़ में कथित दबंगई और जमीन के खेल की चर्चाओं ने एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। सूत्रों के मुताबिक, एक कथित प्रभावशाली भगवाधारी व गुंडा कहे जाने वाले व्यक्ति को जब हरिद्वार के एक वरिष्ठ अधिकारी से अपने मनमाफिक सहयोग नहीं मिला तो उसने सीधे प्रदेश की राजधानी का रुख कर लिया। दो वरिष्ठ संतों को साथ लेकर प्रदेश सरकार के एक बड़े नेता के दरबार में पहुंचने और अधिकारी के तबादले की मांग रखने की चर्चा है। मामला कथित तौर पर एक जमीन पर कब्जे से जुड़ा बताया जा रहा है।
जमीन का मामला, अधिकारी पर दबाव का खेल?
सूत्रों के अनुसार, संबंधित आपराधिक किस्त का भगवाधारी एक जमीन पर अपना कब्जा जमाना चाहता था। इसके लिए उसने हरिद्वार के वरिष्ठ अधिकारी से सहयोग की अपेक्षा की। लेकिन अधिकारी ने नियमों से इतर जाकर किसी प्रकार की मदद करने से इनकार कर दिया।
बस फिर क्या था, अधिकारी की ईमानदारी ही उसकी सबसे बड़ी ‘खता’ बन गई!
आरोप है कि अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए भगवाधारी ने अधिकारी की शिकायत लेकर राजधानी की राह पकड़ ली। वहां कथित तौर पर अधिकारी के सहयोग नहीं करने का हवाला देते हुए उसका तबादला करने की मांग रखी गई।
सत्ता के दरबार में भी नहीं चली कथित दबंगई?
सूत्र बताते हैं कि राजधानी में जिस बड़े नेता से मुलाकात की गई, वे हरिद्वार में कुछ कथित भगवाधारियों की गतिविधियों से पूरी तरह अनजान नहीं हैं। यही वजह बताई जा रही है कि अधिकारी पर सीधे कार्रवाई या तबादले के बजाय मामले में विधि सम्मत कार्रवाई की बात कही गई।
यदि यह बात सही है तो यह घटनाक्रम अपने आप में बड़ा संदेश है, सत्ता के गलियारों तक पहुंच रखने का दावा करने वाला कोई व्यक्ति कानून और प्रशासनिक व्यवस्था से ऊपर नहीं हो सकता।
साथ गए संत भी कथित जमीन विवाद सुनकर हुए नाराज!
इस पूरे घटनाक्रम में एक और चौंकाने वाली बात सामने आ रही है। बताया जा रहा है कि उक्त भगवाधारी व्यक्ति अपने साथ कुछ वरिष्ठ संतों को लेकर राजधानी पहुंचा था। सूत्रों के मुताबिक, इन संतों को पूरे विवाद की वास्तविक पृष्ठभूमि की जानकारी नहीं थी। हालाकि आश्रम आदि पर कब्जा करने में यह भी अपने खेल में पूरी तरह से माहिर हैं। जब उन्हें कथित तौर पर जमीन से जुड़े विवाद और अधिकारी पर बनाए जा रहे दबाव की जानकारी हुई तो उन्होंने नाराजगी जताई।
भगवा वस्त्र कानून से ऊपर नहीं!
हरिद्वार धर्म और आस्था की नगरी है। यहां भगवा वस्त्र त्याग, तपस्या और सेवा का प्रतीक माना जाता है। लेकिन यदि इन्हीं वस्त्रों की आड़ में किसी की जमीन, आश्रम या संपत्ति पर कथित कब्जे की कोशिश हो और सरकारी अधिकारियों पर दबाव बनाने का प्रयास किया जाए तो यह गंभीर चिंता का विषय है।
भगवा किसी को कानून से ऊपर होने का प्रमाणपत्र नहीं देता।
स्थानीय स्तर पर ऐसे आरोप भी चर्चा में हैं कि कुछ भगवाधारी प्रभावशाली लोग लंबे समय से जमीन और संपत्तियों के विवादों में अपना प्रभाव इस्तेमाल करते रहे हैं। कब्जा कर करोड़ों की जमीन को बेचा भी जा चुका है।
शासन-प्रशासन के सामने असली परीक्षा
मामला अब केवल एक अधिकारी के तबादले तक सीमित नहीं रह गया है। सवाल यह है कि क्या किसी अधिकारी को इसलिए हटाने का दबाव बनाया जा सकता है क्योंकि उसने कथित तौर पर नियमों के विरुद्ध सहयोग करने से इनकार कर दिया? इस बात की जांच होनी चाहिए। यदि आरोप निराधार हैं तो जांच के बाद स्थिति साफ होनी चाहिए। और यदि आरोप सही हैं तो भगवा चोले की परवाह किए बिना कानून का डंडा चलना चाहिए। क्योंकि तीर्थनगरी को साधु-संतों की जरूरत है, संपत्ति पर नजर रखने वाले कथित दबंगों की नहीं।


