बाबाओं का बवाल: पद की राजनीति में उलझा संत समाज, दांव पर सनातन की गरिमा

बाबा बनाम बाबा! पद की लड़ाई में दांव पर सनातन की गरिमा

हरिद्वार। संत परंपरा सदियों से त्याग, तप, वैराग्य और लोककल्याण की प्रतीक रही है। लेकिन आज हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि संत समाज की चर्चा आध्यात्मिक चिंतन से अधिक आपसी विवादों, पद की राजनीति और बयानबाजी को लेकर हो रही है। संतों में प्रचलित एक कहावत है— “बाबा नाम बवाल का”। मौजूदा घटनाक्रम को देखकर यह कहावत चरितार्थ होती दिखाई दे रही है।


हरिद्वार से लेकर नासिक, उज्जैन, अयोध्या और अन्य धार्मिक स्थलों तक संत समाज के भीतर विवादों के किस्से लगातार सामने आ रहे हैं। हाल ही में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के महानिर्वाणी गुट के पुनर्गठन के बाद यह विवाद खुलकर सामने आ गया है। एक पक्ष दूसरे को फर्जी बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष अपने पास बहुमत होने का दावा कर रहा है।

एक पक्ष का मेला प्रशासन और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ हुई बैठक में बहुमत भी प्रस्तुत किया गया। इसके बावजूद जोड़-तोड़, बयानबाजी और स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने की होड़ थमती नजर नहीं आ रही।


चिंता की बात यह है कि इस विवाद में ऐसे लोग भी कूद पड़े हैं जिनका न तो सन्यास से कोई गहरा संबंध है और न ही संत परंपरा से। कुछ ऐसे भगवाधारी भी मुखर होकर बयान दे रहे हैं जो केवल भगवा वस्त्र धारण किए हुए हैं, जबकि उनका जीवन पूरी तरह गृहस्थ है। इससे भी अधिक हैरानी की बात यह है कि कुछ तथाकथित संत धनबल के आधार पर किसी के पक्ष या विपक्ष में बयान देने को तैयार हो जाते हैं। यदि ऐसा है, तो यह केवल किसी व्यक्ति का नहीं बल्कि संपूर्ण संत परंपरा का नैतिक पतन कहा जा सकता है।


कुछ बाबाओं के अनुयायी भी इस विवाद को और हवा दे रहे हैं। जबकि संत समाज भली-भांति जानता है कि संतों के बीच मतभेद स्थायी नहीं होते। संतों की लड़ाई को जल में लाठी मारने के समान कहा जाता है—कब मतभेद समाप्त होकर एकता स्थापित हो जाए, यह कहना कठिन होता है। फिर भी सार्वजनिक बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप से संत समाज की प्रतिष्ठा को गहरी क्षति पहुंच रही है।


प्रश्न यह भी है कि जब कोई व्यक्ति संन्यास ग्रहण कर चुका है, तब पद, प्रतिष्ठा और वर्चस्व की इतनी तीव्र लालसा क्यों? संन्यास का मूल भाव तो अहंकार, मोह और पदलोलुपता का त्याग है। यदि वही संन्यासी पद की लड़ाई में उलझ जाएं तो समाज के सामने गलत संदेश जाना स्वाभाविक है।


अखाड़ा परिषद के महानिर्वाणी गुट के पुनर्गठन के बाद यह भी कहा गया कि तेरहों अखाड़े एक सूत्र में बंधे हुए हैं। यदि वास्तव में ऐसा है, तो फिर यह विवाद क्यों? यदि किसी एक व्यक्ति या समूह के कारण पूरे संत समाज में असहजता का वातावरण बन रहा है, तो उसका समाधान भी संत समाज को ही निकालना होगा।


लोकतंत्र में बहुमत सर्वोपरि माना जाता है। इसलिए यदि दोनों पक्ष अपने-अपने दावों पर अडिग हैं, तो उन्हें समाज, अखाड़ों और संबंधित प्रशासन के समक्ष पारदर्शी तरीके से अपना बहुमत सिद्ध कर देना चाहिए। इससे अनावश्यक विवाद समाप्त होगा और संत समाज की गरिमा भी अक्षुण्ण रहेगी।


सनातन धर्म की सबसे बड़ी शक्ति उसकी एकता, मर्यादा और आध्यात्मिक परंपरा रही है। यदि संत समाज ही आपसी खींचतान, बयानबाजी और पद की राजनीति में उलझा रहेगा, तो सबसे अधिक नुकसान उसी सनातन परंपरा का होगा, जिसकी रक्षा का दायित्व संतों के कंधों पर है। समय की मांग है कि विवाद नहीं, संवाद हो; वर्चस्व नहीं, वैराग्य दिखाई दे; और राजनीति नहीं, संतत्व की मर्यादा सर्वोपरि रहे। यदि के व्यक्ति के कारण विवाद की स्थिति उत्पन्न हो रही है तो ऐसे व्यक्ति को दरकिनार कर देना ही उचित कहा जा सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *