जिला मजिस्ट्रेट के खिलाफ कानूनी नोटिस, कार्यपालिका से न्यायिक शक्तियां वापस लेने की मांग

हरिद्वार। जनपद देहरादून के जिला मजिस्ट्रेट न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता एवं देहरादून बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष प्रेमचंद शर्मा के विरुद्ध जिला मजिस्ट्रेट सवीन बंसल द्वारा अधिवक्ता अधिनियम 1961 के तहत उत्तराखंड बार काउंसिल और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को शिकायत भेजकर उनके अधिवक्ता लाइसेंस निरस्त करने पर विचार करने का अनुरोध किए जाने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार वरिष्ठ अधिवक्ता प्रेमचंद शर्मा ने जिला मजिस्ट्रेट न्यायालय में वादों की सुनवाई की प्रक्रिया पर आपत्ति जताई थी। उनका आरोप था कि न्यायालय में कई मामलों में निर्धारित तिथियों पर सुनवाई नहीं होती और अगली तारीख की जानकारी भी अधिवक्ताओं को समय पर नहीं दी जाती। इसी आपत्ति के बाद जिला मजिस्ट्रेट द्वारा उनके खिलाफ शिकायत भेजे जाने की बात सामने आई है।

इस प्रकरण को लेकर हरिद्वार के अधिवक्ता कमल भदोरिया ने अपने अधिवक्ता अरुण भदोरिया के माध्यम से उत्तराखंड शासन के मुख्य सचिव और प्रमुख सचिव (विधि) को कानूनी नोटिस भेजा है। नोटिस में मांग की गई है कि जिला मजिस्ट्रेट, एडीएम, एसडीएम और तहसीलदार जैसे कार्यपालिका अधिकारियों से न्यायिक एवं अर्ध-न्यायिक शक्तियां वापस लेकर स्वतंत्र न्यायिक तंत्र स्थापित किया जाए।

नोटिस में कहा गया है कि कई कार्यपालिका अधिकारी विधि की पढ़ाई किए बिना ही न्यायिक कार्यों का निस्तारण करते हैं, जिससे न्याय प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित होती है और नागरिकों के प्राकृतिक न्याय के अधिकारों का हनन होता है। इसमें यह भी उल्लेख किया गया है कि देश के विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित न्यायिक ट्रिब्यूनलों में न्यायिक सदस्य नियुक्त किए जाते हैं, इसलिए राजस्व और अन्य मामलों में भी इसी प्रकार की व्यवस्था लागू की जानी चाहिए।

अधिवक्ता कमल भदोरिया ने नोटिस में यह भी मांग की है कि राज्य में एक नया रेवेन्यू ट्रिब्यूनल्स एक्ट बनाकर स्वतंत्र न्यायिक ट्रिब्यूनल स्थापित किए जाएं और उनमें 50 वर्ष से अधिक आयु के अनुभवी अधिवक्ताओं को न्यायिक सदस्य या विशेष न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया जाए।

नोटिस में यह भी कहा गया है कि कार्यपालिका अधिकारियों द्वारा कई मामलों में प्रशासनिक दबाव में निर्णय लिए जाते हैं, जिससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होती है। साथ ही धारा 107 और 116 सीआरपीसी के मामलों में भी कई बार बिना पर्याप्त साक्ष्य के कार्रवाई किए जाने के आरोप लगाए गए हैं।

नोटिस के माध्यम से उत्तराखंड शासन को 30 दिनों के भीतर इस संबंध में आवश्यक कार्रवाई करने की मांग की गई है। साथ ही चेतावनी दी गई है कि यदि निर्धारित समयावधि में कार्रवाई नहीं की गई तो इस मामले को लेकर उत्तराखंड उच्च न्यायालय में जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की जाएगी।

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