गजब: अब किन्नरों की बैशाखी के सहारे संन्यासी!

अब किन्नर करेंगे असली और कालनेमि संत की पहचान
हरिद्वार।
वैसे कहावत है कि प्यार और जंग में सब कुछ जायज होता है, किन्तु यदि जंग धर्म क्षेत्र में हो तो मर्यादा और नियमों का पालन करना आवश्यक हो जाता है। कारण की धर्म कभी भी अधर्म के मार्ग का अनुसरण करने की शिक्षा नहीं देता। और धर्म के मार्ग पर चलने का दंभ भरने वालों को तो अधर्म के संबंध में सोचना भी पाप माना गया है। मगर वर्तमान में ऐसा कुछ होता दिखायी दे रहा है।


संतों की आपसी लड़ाई में शह देने के लिए अब संतों को किन्नरों का सहारा लेना पड़ रहा है। जिसके चलते कौन असली संत है और कौन कालनेमि इसके लिए किन्नर अखाड़े की मुखिया अभियान चलाएंगी। एक अखाड़े द्वारा संचालित अखाड़ा टीवी में 17 मार्च को एक पोस्ट डाली गयी। जिसमें हत्या के आरोपित कालनेमि और अन्य कालनेमियों को बेनकाब करने के लिए किन्नर अखाड़े की आचार्य महामण्डलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी कालनेमियों के खिलाफ अभियान चलाकर उनको बेनकाब करने का कार्य करेंगी।


आचार्य महामण्डलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी को यह जिम्मेदारी किसने दी है, इसको बताने की आवश्यकता नहीं है। सब जानते हैं कि आचार्य महामण्डलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने यह बयान क्यों दिया। और अखाड़ा उसे प्रचारित और प्रसारित क्यों कर रहा है।


धार्मिक क्षेत्र के जानकारों के मुताबिक यह बड़ा ही हास्यास्प्रद है कि सन्यासियों की पहचान भले ही वह कालनेमि हो, एक किन्नर अखाड़े की आचार्य महामण्डलेश्वर करेंगी। जानकारों के मुताबिक जिनको संन्यास का अधिकार तक नहीं वह कैसे एक संन्यासी भले ही वह कालनेमि हो उसकी पहचान कैसे करने का कार्य कर सकते हैं। इसका मतलब साफ है कि या तो सन्ंसाय का वजूद समाप्त हो गया है, जो कालनेमियों के कारनामे उजागर करने के लिए किन्नरों को सहारा लेना पड़ रहा है। या फिर उनमें किन्नरों जितनी ताकत भी शेष नहीं बची, जो कालनेमियों का पर्दाफाश कर सकें और धर्म के मार्ग को निष्कंटक करने का कार्य कर सकें।


धार्मिक क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि भगवाधारण किए तो सैंकड़ों कालनेमि मठ, मंदिर, आश्रम-अखाड़ों में भरे पड़े हैं। यदि यह अभियान चलाया भी जाता है तो किस-किस के खिलाफ अभियान चलाया जाएगा। क्या फर्जी शंकराचार्य बनकर घूमने वाले कालनेमि की श्रेणी में नहीं रखे जाएंगे। रेवडि़यों की भांति जगद्गुरु के पद बांटने वालों और बनाने वालोें को क्या कहा जाएगा। संत होकर मंहिलाओं का शोषण करने वालों को क्या कहंेगंे। लोगों की सम्पत्ति पर कब्जा करने वाले, अपहरण, बलात्कार के प्रयास जैसे गंभीर मामलों में आरोपित, दलाली करने वाले, लोगों का प्रमोशन और ट्रांसफर कराने, चुनाव में टिकट दिलाने के नाम पर वसूली करने वालों को क्या कालनेमि नहीं कहा जाएगा। धर्म की सम्पत्ति को बेचकर ऐश करने वालों को क्या कहा जाएगा। हरिद्वार धर्मनगरी में ऐसे कई हैं, जो कालनेमियों का पर्दाफाश करने की बात करते हैं और स्वंय धोखाधड़ी कर जमीन कब्जाने के मामले में मुकदमों का सामना उनको करना पड़ रहा है।


ऐसे में सवाल उठता है कि यदि कालनेमियों का सही से पर्दाफाश करने के लिए अभियान चलाया जाए तो कितने बचेंगे। कई मठ-मंदिर, आश्रम-अखाड़े तो खाली ही हो जाएंगे। जिस प्रकार से समय-समय पर कथित भगवाधारियों की बयानबाजी सामने आती रहती है, यदि वह कालनेमियों के खिलाफ स्वंय बिगुल बजा दें और अपने आश्रम-अखाड़ों में उन्हें प्रवेश न करने दें व विलासिता के जीवन का त्याग कर दें तो स्वंय कालनेमियों की समाप्ति हो जाएगी।

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