सनातन की पुर्नस्थापना में आदि जगद्गुरु का विशेष योगदानः रविन्द्र पुरी

शंकराचार्य ने आध्यात्मिक व सांस्कृतिक एकता को दी मजबूतीः विश्वेश्वरानंद गिरि
हरिद्वार। भाष्यकार जगद्गुरु भगवान शंकराचार्य महाराज की जयतीं मंगलवार को श्री आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्मारक समिति के अध्यक्ष महा मण्डलेश्वर आचार्य स्वामी विश्वेश्वरानंद गिरि महाराज की अध्यक्षता में उल्लासपूर्वक मनाई गई। इस अवसर पर प्रातः शंकराचार्य चौक स्थित आदि जगद्गुरु के श्रीविग्रह का विधि पूर्वक पूजन-अर्चन किया गया। उसक बाद श्री सूरतगिरि बंगला गिरिशानंद आश्रम में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। जिसमें सभी सम्प्रदायों के संतों, महंतों, महामण्डलेश्वरों ने उपस्थित होकर आचार्य शंकर को अपने श्रद्धासुमन अर्पित किए।


इस अवसर पर अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष व श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी के सचिव श्रीमहंत रविन्द्र पुरी महाराज ने आदि शंकराचार्य को मात्र 8 वर्ष की छोटी आयु में सभी वेदों का ज्ञान प्राप्त हो गया था।


आदि शंकराचार्य ने सनातन धर्म की जड़ों को बढ़ाने और मजबूत करने के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य किया। आदि शंकराचार्य ने देश की सांस्कृतिक और आध्यात्मिकता के क्षेत्र में अतुलनीय काम किया। उन्होंने कहाकि देश को धार्मिक और आध्यात्मिक एकता के लिए आदि शंकराचार्य ने विशंेष कार्य किया। जिसमें उन्होंने उत्तर भारत में बदरीनाथ धाम की स्थापना की थी और इस धाम में दक्षिण भारत के ब्राह्राण पुजारी को रखा। दक्षिण भारत में रामेश्वरम में उत्तर भारत के पुजारी को रखा। पूर्वी भारत के धाम जगन्नाथ मंदिर में पश्चिम भारत के पुजारी और पश्चिम भारत के मंदिर में पूर्वी भारत के पुजारी को रखा। इसके पीछे भारत के आध्यामिक और सांस्कृतिक को मजबूती देते हुए पूरे देश को एकता के सूत्र में बांधना के मात्र कारण था। इसके अलावा आदि शंकराचार्य ने दशनामी संन्यासी अखाड़ों की भी स्थापना में अपना योगदान दिया था।


श्री सूरत गिरि बंगला गिरिशानंद आश्रम के परमाध्यक्ष महा मण्डलेश्वर स्वामी विश्वेश्वरानदं गिरि महाराज ने कहाकि आदि शंकराचार्य भगवान को आठ साल की उम्र में वेदों का पूरा ज्ञान हो गया था और 12 वर्ष की उम्र में शास्त्रों का अध्ययन कर लिया था। 16 वर्ष की अवस्था में 100 से भी अधिक ग्रंथों की रचना कर चुके थे। मात्र 32 साल की उम्र में केदाननाथ में उन्होंने समाधि ली। उन्होंने कहाकि सनातन धर्म की रक्षा और उसकी पुर्नस्थापना में आदि जगद्गुरु के योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता। उन्होंने सभी से आदि जगद्गुरु के बताए मार्ग का अनुसरण करने की अपील की।
श्रद्धांजलि सभा के बाद विशाल भण्डारे का आयोजन किया गया। इस अवसर पर महामण्डलेश्वर गिरधर गिरि महाराज, महामण्डलेश्वर स्वामी सोमेश्वरानंद गिरि महाराज, महामण्डलेश्वर आनन्द चैतन्य, महामण्डलेश्वर ललितानंद गिरि, महा मण्डलेश्वर विश्वात्मा नंद मािराज, महा मण्डलेश्वर तेजोमयानंद, महामण्डलेश्वर प्रेमानंद, श्रीमहंत ज्ञानदेव सिंह महाराज, समिति के सचिव महंत देवानदं सरस्वती महाराज, स्वामी उमानंद गिरि, स्वामी कमलानंद गिरि, स्वामी कृष्णानंद गिरि, स्वामी दिलीप गिरि, स्वामी केश्वानंद समेत सैंकड़ों संत-महात्मा मौजूद रहे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *