संतों की कैकयी बना आचार्य पट्टाभिषेक समारोह विवाद का मूल कारण

हरिद्वार। संतों के वहिष्कार के बाद भी आवाह्न अखाड़े की आचार्य पीठ पर अरूण गिरि का पट्टाभिषेक हो गया। अरूण गिरि के आचार्य बनाए जाने की चर्चा के साथ ही संतों ने ही विरोध करना शुरू कर दिया था। कुछ संत खुलकर सामने आए तो कुछ अंदरखाने विरोध में रहे। जूना पीठाधीश्वर ने तो समारोह के वहिष्कार की घोषणा कर ही दी थी। जबकि उन्हीं की अध्यक्षता में यह कार्यक्रम होना था।


सूत्र बताते हैं कि विरोध शुरू होने के साथ ही अखाड़े के संत दो धड़ों में बंट गए थे, एक अरूण गिरि के पक्ष में तो दूसरा गुट विरोध में उतर आया था। सूत्र बताते हैं कि संतों की कैकेयी ही इस विवाद की मुख्य सूत्रधार थी, जो मामला फंसाकर चुपचाप किनारे हो गई। जिसके बाद अखाड़े के पदाधिकारियों की पट्टाभिषेक करना मजबूरी हो गई।


बता दें कि संतों की कैकेयी को सदैव पद की लालसा और धन की चाहत बनी रहती है। सूत्र बताते हैं कि संतों की कैकेयी ने ही लेनदेन कराया था। पैसा हाथ में आने और आपस में बंटने के बाद पदाधिकारियों द्वारा मामले से हाथ पीछे खिंचना मुश्किल हो गया था। मुश्किल इसलिए की यदि अरूण गिरि को आचार्य नहीं बनाते हैं तो पैसा वापस करना पड़ेगा। जबकि आई हुई माया को कोई वापस करना नहीं चाहता। इतना ही नहीं जो विरोध में थे उनके भी स्वर बदल गए। आचार्य पद के लिए पैसों के लेनदेन का आरोप जूना अखाड़े के महामण्डलेश्वर स्वामी प्रबोधानंद गिरि लगा चुके हैं तथा प्रधानमंत्री को पत्र भी भेज चुके हैं।


सूत्र बताते हैं कि आवाह्न अखाड़ंे के आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी शिवेन्द्र पुरी महाराज के ब्रह्मलीन होने से एक दिन पूर्व अखाड़े के पदाधिकारियों ने मुंबई के एक होटल के कमरे में एक और संत को आचार्य बनाने के लिए फंसाया था। जिससंे इन्होंने 4 करोड़ रुपये, आचार्य पीठ और अन्य व्यवस्था की मांग की थी। कमरे में मौजूद सभी संतों की बात सुनने के बाद उस संत ने इन्हें जमकर फटकार लगाई थी। संत का कहना था की मैं पैसे क्यों दूं। तुम्हें पैसा देने से अच्छा है कि मैं किसी गरीब ब्राह्मण, असहाय व गौशाला के कार्य में अपना धन लगाऊं। संत की बात सुनकर सब मौन रह गए। एक संत के हाथ से निकल जाने के बाद दूसरे को यह हाथ से निकलने देना नहीं चाहते थे। इसी के चलते कैकेयी ने मामला तय कराया और ऐन वक्त पर अपने आप कार्यक्रम से दूरी बना ली। यदि पैसा वापस करने की बात नहीं होती तो अरूण गिरि का पट्टाभिषेक होना मुमकिन नहीं था।

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