पांचवीं शंकराचार्य पीठ के ऐलान पर घमासान, ज्ञान और परंपरा पर उठे सवाल

हरिद्वार। आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार प्रमुख मठों के बाद अब पांचवीं शंकराचार्य पीठ के गठन का दावा सामने आया है। श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी के महामंडलेश्वर वैराग्यानंद उर्फ मिर्ची बाबा का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने कहा है कि यदि चार शंकराचार्य पीठ हो सकती हैं तो पांचवीं पीठ क्यों नहीं बनाई जा सकती। उन्होंने वाल्मीकि पीठ के नाम से पांचवीं शंकराचार्य पीठ के गठन की घोषणा की है।

वीडियो में मिर्ची बाबा ने कहा कि भगवान सबके हैं और सभी भगवान के हैं, इसलिए वाल्मीकि पीठ का भी निर्माण होना चाहिए। उनके इस बयान के बाद संत समाज और धार्मिक परंपराओं से जुड़े लोगों के बीच पांचवीं शंकराचार्य पीठ के औचित्य को लेकर चर्चा शुरू हो गई है।

हालांकि, वायरल वीडियो में दिए गए कुछ धार्मिक एवं साहित्यिक संदर्भों को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहाकि संत कबीर दास ने कहाकि मन चंगा तो कठौती में गंगा’। अब जो व्यक्ति पांचवी शंकराचार्य पीठ का गठन करने जा रहा हो और उसे इस बात का भी पता न हो कि उक्त पक्ति संत कबीर दास का नहीं संत रविदास से जुड़ा प्रसिद्ध कथन है। इसी तरह उन्होंने कहाकि ‘उल्टा नाम जपे जग जानी, वाल्मीकि भए ब्रह्म समानी’ बोला जबकि तुलसीदास ने मानस में ‘उल्टा नाम जपे जग जाना, वाल्मीकि भए ब्रह्म समाना’ लिखा है। ऐसे में जब कोई श्ंाकराचार्य का चयन करने जा रहा हो तो उसे किसी की वाणी का उल्लेख करने से पहले थोड़ा पढ़-लिख लेना चाहिए। वरना ज्ञान की जगह अखाड़ा-अखाड़ा खेलते ही रह जाएंगे।

यूं तो मिर्ची बाबा ने चार पीठ की स्थापना की बात करते हुए कहाकि चार पीठ तो पांचवी क्यों नहीं। अब इन महाशय को यह कौन बताए की आदी शंकराचार्य क्या थे। किन ग्रंथों की उन्होंने रचना की। दिग्विजय उन्होंने किया। चार मठ स्थापित किए। सनातन के पुनरूद्धार का कार्य उन्होंने किया। पांचवी पीठ का निर्माण करने का दावा करने वालों का ज्ञान कितना है और उन्होंने देश व समाज के लिए क्या किया यह भी समाज के समक्ष आना चाहिए। केवल पीठ बनाने की घोषणा मात्र से कार्य होने वाला नहीं है।

किसी को सूर्पनखा और ताड़का आदि से सम्बोधित करना शंकराचार्य पीठ की स्थापना का दावा करने वाले के लिए शोभनीय नहीं कहा जा सकता। सुर्खियों में बने रहने के लिए बयानबाजी करने से श्रेष्ठ है कि ज्ञानार्जन कर समाज उत्थान के लिए कुछ किया जाए। शंकराचार्य केवल किसी पद या पीठ की स्थापना से जुड़ी उपाधि नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी दार्शनिक, आध्यात्मिक और शास्त्रीय परंपरा रही है। आदि शंकराचार्य ने वेदांत दर्शन के प्रचार-प्रसार के साथ देश के विभिन्न क्षेत्रों में मठ परंपरा को स्थापित और सुदृढ़ किया।

पांचवीं पीठ के गठन के दावे को पर नई पीठ की स्थापना के लिए धार्मिक और शास्त्रीय आधार क्या होगा तथा उसके शंकराचार्य के चयन की प्रक्रिया और मानदंड क्या होंगे। केवल घोषणा करने से किसी नई पीठ को पारंपरिक शंकराचार्य पीठ के समान मान्यता मिलना अलग विषय है।

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