अखाड़ों से निकली सत्ता की सियासत: नागाओं के शौर्य से राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और गृह मंत्रालय तक का सफर

काशी से हरिद्वार तक मुगल सत्ता से टकराव की गौरवगाथा, महानिर्वाणी अखाड़े की परंपरा में आज भी जीवंत है इतिहास

हरिद्वार। श्री शंभू पंच दशनाम आवाहन अखाड़े के श्रीमहंत गोपाल गिरि महाराज ने कहा कि अखाड़ों का इतिहास केवल साधना, धर्म और सनातन परंपराओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समय-समय पर इन अखाड़ों ने सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक दौर ऐसा भी था, जब अखाड़ों की शक्ति और उनके नागा संन्यासियों के शौर्य से तत्कालीन मुस्लिम और अंग्रेजी हुकूमत तक प्रभावित और भयभीत बताई जाती थी।

परंपरागत रूप से अखाड़ों को लेकर यह भी कहा जाता है कि देश की सत्ता के अलग-अलग शीर्ष पदों की तुलना अखाड़ों की परंपराओं और प्रभाव से की जाती रही है। इसी संदर्भ में राष्ट्रपति को ‘आवाहन अखाड़ा’, प्रधानमंत्री को ‘अटल अखाड़ा’ और गृह मंत्री को ‘महानिर्वाणी अखाड़ा’ से जोड़कर देखा जाता है। यह तुलना अखाड़ों के ऐतिहासिक प्रभाव और उनकी संगठनात्मक शक्ति को रेखांकित करने के लिए की जाती है।

काशी में औरंगजेब की सेना से हुआ संघर्ष
श्रीमहंत गोपाल गिरि महाराज ने कहा कि वर्ष 1664 में काशी स्थित ज्ञानवापी की रक्षा के लिए नागा संन्यासियों और मुगल सेना के बीच संघर्ष हुआ था। उस समय औरंगजेब की ओर से मिर्जा आदि तुरंग खां एवं अब्दुल अलीम के नेतृत्व में बड़ी सेना भेजे जाने का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि नागा संन्यासियों ने मुगल सेना का सामना किया और धार्मिक स्थलों की रक्षा के लिए अपना अदम्य साहस दिखाया।

1666 में हरिद्वार में भी हुआ संघर्ष
उन्होंने बताया कि इसी क्रम में वर्ष 1666 में हरिद्वार पर आततायी सेना के आक्रमण का भी उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि उद्देश्य हरिद्वार की धार्मिक और आध्यात्मिक पवित्रता को नुकसान पहुंचाना था। उस समय महानिर्वाणी अखाड़े के नागा संन्यासियों ने शंखनाद कर मोर्चा संभाला।
इस संघर्ष में सर्वश्री गायब गिरी, लक्ष्मी गिरी, अभयनाथ भारती, जीवन पुरी जंगसार, विशाल पुरी, वनखण्डी भारती, सहजवन अग्निहोत्री, बहादुर गिरी, ध्यान गिरी, परशुराम गिरी, इन्द्र गिरी और भोला गिरी जैसे नागा संन्यासियों के नाम वीरता के साथ लिए जाते हैं। कहा जाता है कि इन नागा साधुओं ने मुगल सेना का डटकर मुकाबला किया और हरिद्वार की धार्मिक अस्मिता तथा पवित्रता की रक्षा के लिए संघर्ष किया।

धर्म, शौर्य और संगठन का केंद्र रहा महानिर्वाणी अखाड़ा
श्रीमहंत गोपाल गिरि महाराज ने कहा कि महानिर्वाणी अखाड़े की परंपरा में साधना के साथ-साथ धर्मरक्षा और सामाजिक दायित्व को भी महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। नागा संन्यासियों की युद्धक परंपरा इसी व्यापक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का हिस्सा रही है।
काशी और हरिद्वार से जुड़ी ये घटनाएं अखाड़ों की उस भूमिका की ओर संकेत करती हैं, जिसमें संत-संन्यासियों ने आवश्यकता पड़ने पर धार्मिक स्थलों और परंपराओं की रक्षा के लिए संघर्ष किया। इसीलिए महानिर्वाणी अखाड़े को केवल एक धार्मिक संस्था के रूप में नहीं, बल्कि सनातन परंपरा, संगठन, साधना और शौर्य की ऐतिहासिक धरोहर के रूप में भी देखा जाता है।

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