आसक्ति के बाँध से मुक्ति का मार्ग

तुम संसार में आँखों से कुछ देखते हो; समझो कुछ भी देखते हो; किसी का बँगला देखते हो, किसी की गाड़ी देखते हो, या किसी शरीर को देखते हो और तुम उसमें कहीं पर अटक जाते हो कि हाय ये मेरा घर होना चाहिए, हाय मेरे पास ऐसी गाड़ी नहीं है, हाय मेरे पास भोगने के लिए ऐसी देह नहीं है! अगर तुम संसार की किसी भी चीज़ में अटक जाते हो, वो चीज़ अगर तुम्हारे अंदर चल रही है या वो विचार तुम्हारे अंदर चलते जाते हैं, और ये पाँच मिनट से ज्यादा चलते हैं, तो तुम उन नकारात्मक विचारों में अटक गये; एक तो है कि तुमने सोचा कि घर चाहिए, बात खत्म हो गई, ठीक है! मैं इस तरह का घर लूँगा, अब उस बात को खत्म कर दिया । अब तुम देखोगे कि तुम्हारे पास कितना पैसा है, क्या घर ले सकता हूँ, कि नहीं ले सकता हूँ, उसे किस साल में लूँगा। तुमने किसी की गाड़ी देखी, तुम्हारा मन हुआ मैं ऐसी गाड़ी लूँ, और तुम्हारे अंदर विचार चला गया।

फिर तुमने सोचा कि चलो देखेंगे पेमेंट कितनी आती है, क्या हिसाब-किताब है। तुमने कोई शरीर देखा; सुंदर है, प्यारा है, बढ़िया है; तो बस बढ़िया है, बहुत अच्छी बात है और तुम आगे चल दिए। परंतु अगर अंदर तुम इन विचारों के साथ बहे नहीं, यानी तुम अटक गये; चाहे तुम घर में बैठे हों, ऑफिस में बैठे हों, या सड़क पर चल रहे हों और तुम विचारों के साथ बहे नहीं, तुम विचारों के साथ अटक गये कि हाय मेरा घर ऐसा हो, हाय मेरा घर कैसे होगा? या मेरे पास गाड़ी हो; हाय गाड़ी कैसे होगी? तुम्हारे अंदर अटक हो गई, पाँच मिनट निकल गए; उसी एक पर तुम्हारी सुई अटक गई। किसी शरीर को भोगने के लिए तुम्हारी सुई अटक गई; पाँच मिनट पार हो गये; तुमने अब परमात्मा की दी इन इंद्रियों को, सुंदरता को, मौज को, भोग को जो तुम्हारे को अंदर रिलैक्स दे सकती थी, योग करवा सकती थी, तुमने अब उस भोग को अंदर ले लिया; अब वो भोग बाहर से अंदर चला गया। जब भोग अंदर ट्रांसफर हो जाता है, तुम्हारे मन के अंदर एक नेगेटिव मार्किंग लग जाती है।

नेगेटिव यानी जैसे तुमने पानी को बाँध लगा दिया, जैसे बहती नदी को बाँध लगा दिया, अपने विचारों को तुमने कहीं रोक दिया। अब उन रुके हुए विचारों के साथ अटक आ गई तो तुम्हारे जीवन का पूरा खेल शुरू हो जाता है, वो रुके हुए विचार में जो अटक आ गई, यानी नेगेटिव मार्किंग, उसमें सब रिकॉर्ड हो जाता है। इसको ये बँगला चाहिए, इसको ये गाड़ी चाहिए या इसको ये भोगने के लिए शरीर चाहिए; जो विचार बहना था वो बंद हो गया। फिर आगे जिंदगी में मरते दम तक ये मन यानी तुम्हारे विचारों का मृत्यु तक ऐसे ही खेल चलता रहता है। अब ये जो पूरी रुकावट है, रुके हुए विचार की, पाँच मिनट से अधिक रुकावट; किसी चीज में अटकना, किस चीज की इच्छा करना, किसी चीज के अंदर बिल्कुल पागल हो जाना; जितना तुम विचारों में अटकते हो, जितना तुम उसमें बहते हो, उतना ही तुम्हारे मन के अंदर नेगेटिव मार्किंग हो जाती है।

अगर मौत से पहले तुम जाग गये और बहने लगे, इंद्रियों के रस को बाहर ही रखते हो, बाहर वाले भोग को अंदर नहीं ले जाते; बाहर अच्छा है, बढ़िया है, जो भी है, वाह-वाह है, पर वो तुम अंदर नहीं ले जाते, तो फिर तुम्हारे सारे किए हुए पिछले जन्म के कर्म यानी जितने भी बार तुम्हारे मन में विचार अटके, वो सारे के सारे विचार मिटा दिए जाते हैं, परमात्मा तुम्हारे मन के सारे काले धब्बों को खत्म कर देता है। तुम्हारे किए हुए उन गुनाहों को माफ कर देता है। क्योंकि परमात्मा ने कहा कि अगर तू गृहस्थ, संसार में है तो पाँच मिनट से ज्यादा अगर तू अपने विचारों में अटक गया, भोग में अटक गया, भोग अंदर चला गया, तो ये तेरे से गुनाह हो गया। क्योंकि बहती गंगा को बाँध नहीं लगाना है। तुम्हारे अंदर के विचार बहती गंगा की तरह होने चाहिए, ना कि तुम उनको रोक दो, बाँध लगा दो। बाँध लगाते ही तुम जैसे मेरे को कहीं रोक देते हो, क्योंकि प्रकृति मेरी है, मन मेरा है। जब तुम उसमें बाँध नहीं लगाते, तो तुम्हारी स्थिति अपने आप अच्छी होती चली जाती है, तुम्हारा रिलैक्स बना रहता है, मौज बनी रहती है। सबसे महत्वपूर्ण है कि तुम्हें अपने विचारों पर बाँध नहीं लगाना है, अटक नहीं लगानी है।

अपने विचारों को तुम बहते हुए देखो; बाहर कुछ भी है बढ़िया है, वाह-वाह है, अच्छी चीज है, भोग है, बढ़िया है, भोग कोई खराब थोड़े ही हैं, सब कुछ अच्छा है। गाड़ी क्यों नहीं चाहिए? बँगले क्यों नहीं चाहिए? कोई शरीर क्यों नहीं चाहिए? संसार के अंदर है तो सब जरूरी है, परंतु इसमें अटक, रुकना, रुकाव! अगर तुम्हारे अंदर रुकाव आ गया और उसके लिए आसक्ति हो गई तो फिर वो नेगेटिव मार्किंग है। पाँच मिनट तक सिर्फ माफी है, पाँच मिनट के बाद वो विचार तुम को नेगेटिव ले जाते हैं, तुम्हारे भोग की सारी अवस्था को उस मन में कैद कर देते हैं और मरते दम तक जितनी तुम्हारी भोग की अवस्था ज्यादा होगी उतना ही जन्म-मरण का अगला जो चक्र है, वो कहीं ना कहीं उतना ही गंभीर होगा, दयनीय होगा। इसलिए कहा कि मन को समझना बहुत जरूरी है। मन ही तुम्हारे जन्म-मरण का आधार है, मन ही तुम्हारे आगे के जन्मों का आधार है, मन ही तुम्हारी मुक्ति का भी आधार है।

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