हरिद्वार। श्री अखंड परशुराम अखाड़े के पंडित अधीर कौशिक ने श्रावण मास में शुरू होने वाली कांवड़ यात्रा को लेकर शिवभक्तों के लिए आवश्यक नियमों और धार्मिक मर्यादाओं की जानकारी दी। पत्रकारों से वार्ता करते हुए उन्होंने कहा कि कांवड़ यात्रा केवल आस्था का पर्व नहीं, बल्कि अनुशासन, पवित्रता और सनातन परंपराओं के पालन का भी प्रतीक है। उन्होंने सभी शिवभक्तों से नियमों का पालन करते हुए श्रद्धा और भक्ति के साथ यात्रा पूरी करने का आग्रह किया।
पंडित अधीर कौशिक ने बताया कि कांवड़ यात्रा पर निकलते समय घर से बहन के हाथों तिलक और आरती कराकर तथा बड़ों का आशीर्वाद लेकर प्रस्थान करना शुभ माना जाता है। हरिद्वार पहुंचकर सबसे पहले मां गंगा को प्रणाम करें और जिस उद्देश्य से कांवड़ ला रहे हैं, उसका संकल्प लेकर गंगाजल कांवड़ में स्थापित करें।
उन्होंने कहा कि कांवड़ उठाने के बाद यदि रास्ते में लघुशंका करनी पड़े तो हाथ, पैर और मुंह धोने के बाद ही कांवड़ उठाएं। यदि शौच के लिए जाना पड़े तो स्नान करने और धूप-दीप दिखाने के बाद ही दोबारा कांवड़ उठानी चाहिए। यात्रा के दौरान किसी भी प्रकार का नशा पूरी तरह वर्जित है।
उन्होंने शिवभक्तों से अपील की कि यात्रा के दौरान केवल शुद्ध सात्विक (वैष्णव) भोजन करें। जहां भी भंडारे में प्रसाद ग्रहण करें, वहां अपनी श्रद्धानुसार दान अवश्य दें। साथ ही कांवड़ को गुलर के पेड़ के नीचे से नहीं ले जाना चाहिए।
जलाभिषेक के बाद घर लौटने पर बहन से आरती कराकर और उसे नेग देकर ही घर में प्रवेश करें। कांवड़ खोलने से पहले घर में भगवान सत्यनारायण की कथा कराएं तथा बहन या कन्या के हाथों कांवड़ का पहला धागा खुलवाएं।
पंडित अधीर कौशिक ने कहा कि कांवड़ यात्रा के दौरान देवी-देवताओं का स्वरूप धारण कर फिल्मी गीतों पर नृत्य करना धार्मिक दृष्टि से अनुचित है। उन्होंने श्रद्धालुओं से सनातन से जुड़े व्यापारियों से ही कांवड़ सामग्री खरीदने, राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान बनाए रखने तथा अपनी कांवड़ पर भगवा ध्वज लगाकर सनातन संस्कृति की पहचान को बढ़ावा देने की अपील की। इसके साथ ही उन्होंने ताजिये के रूप वाली बड़ी कांवड़ न बनाने की अपील की।
उन्होंने कहा कि कांवड़ यात्रा को भगवान शिव के भजनों, “बम-बम भोले” के जयकारों और पूर्ण श्रद्धा, अनुशासन एवं मर्यादा के साथ संपन्न करें। इससे यात्रा का आध्यात्मिक महत्व और पुण्य दोनों बढ़ते हैं। इस अवसर पर आचार्य पवन शास्त्री, आचार्य विष्णु शास्त्री, स्वामी रूद्रानंद, स्वामी कार्तिक गिरी, ऋषि शर्मा, दिनेश बाली मौजूद रहे।


