कबीर जयंती विशेष: ‘मैं’ से परे सत्य की खोज

आज कबीर जयंती है, यानी संत कबीर का दिन है। कबीर, भगवान की बात करने वाले वो संत थे, जिन्होंने आखिरी साँस तक सिर्फ और सिर्फ भगवान की बात की। भगवान कौन ? भगवान परम धर्म है, यानी परम अवस्था; तुम्हारे अंदर की आत्मा, चेतना की अवस्था। अंदर आत्मा की शिक्षा देने वाले को सत्य गुरु कहा गया है। भगवान की डिग्री दिलवाने वाला होता है सतगुरु। सत् की डिग्री ब्रह्मांड के पार से आती है। इसलिए ये अकेले की यात्रा है।

कबीर कहते हैं “जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ।” गहरे जाना पड़ेगा। ये नहीं कि रट लो और सुबह फिर भूल जाओ। जो नकल से होता है, वो सत् नहीं है। सत् का अर्थ है – स्वयं की खोज, स्वयंभू। कबीर भगवान के दूत हुए। भगवान के दूत मतलब, ईश्वर का ज्ञान देने वाले सत्यगुरु। कैसे पहुँचा जा सकता है उस सत् तक? सत्संग यानी परमात्मा का संग। सत्यगुरु वो, जो परमात्मा से मिलाएगा। सत्यगुरु, यानी उसके साथ ग्रंथ मैच करना चाहिए, कबीर की वाणी मैच करनी चाहिए। कबीर को एक अनूठा संत माना जाता है। कबीर एक ऐसे संत हैं, जिन्होंने संसार के सारे नियमों को ताक पर रख दिया, सारी शर्तों को खत्म कर दिया, और संसार की सारी स्थितियाँ तोड़ दीं। यदि किसी के पास पैसा नहीं है, या पढ़ाई नहीं है, तो वह कबीर से सीख ले सकते हैं। कबीर ने शादी की थी, उनके बच्चे भी हुए। उन्हें देखने के बाद लगता ही नहीं है कि कोई शर्त चाहिए परमात्मा को पाने के लिए। इसलिए कबीर अनूठे थे।

कबीर ने वाराणसी में रहते हुए अंत तक यह कहा कि जो लोग कहते हैं, “हम धार्मिक हैं”, उन्होंने बाहर के शरीर से धर्म को ओढ़ा है। ये आंतरिक धर्म नहीं है क्योंकि तुम ‘मैं-मेरा’ में फँसे हुए हो। जब तक ‘मैं-मेरा’ है, कोई धर्म नहीं है। कबीर जी का एक बहुत प्रसिद्ध दोहा है “पूजा सेवा नेम व्रत गुड़ियन का सा खेल। जव लग पिउ परसै नहीं तव लग संसय मेल।” अर्थार्थ, ये शरीर की बात नहीं है, अंतःकरण की बात है। उन्होंने कहा, “पूजा, सेवा, नेम, व्रत !” तुम्हारा ये व्रत क्या है? तुम बाहर के व्रत की बात करते हो, तुम बाहर की सेवा, बाहर की पूजा, बाहर के नेम-ताम की बात करते हो, यह सब शरीर से जुड़ा हुआ है; “गुड़ियन का सा खेल!” जैसे गुड्डा-गुड्डी से खेलते हैं, यह वैसा खेल है। तुम शरीर से बाहर जो भी करते हो, इससे कुछ नहीं होगा। “जब लग पिउ परसे नहीं।” अर्थार्थ, जब तक वो परमात्मा, वो प्यारा अंदर नहीं आ जाता, “तब लग संसय मेल,” तब तक अंदर संशय चलते रहते हैं। जब तक परमात्मा अंदर नहीं आया, संदेह लगता है, कि अब क्या होगा? तब तक संशय ही आते हैं। यह उन लोगों के लिए है ,जो धर्म को बाहर से लेते हैं, अंदर की यात्रा नहीं करते। जो अंदर की यात्रा करते हैं, और आगे आ जाते हैं, उनके लिए नहीं है।

तुम सबक ले सको, इसलिए कबीर प्यारे का ये दोहा बताया कि शायद कुछ तुम्हारे अंदर गया होगा, इसको समझा होगा और अगर समझ आ गई हो तो रमज खुलेगी। एक ना एक दिन, एक ना एक साल, एक ना एक जन्म में, एक ना एक युग में आगे आना ही पड़ेगा क्योंकि ‘मैं’ का काँटा सिर्फ सत्य गुरु निकालता है। जीवन में तत्व ज्ञानी गुरु एक ही बार मिलता है, और तत्व ज्ञानी गुरु का अर्थ है, जो जिंदा आग है। उम्मीद है कि इस दोहे को थोड़ा समझ गए होंगे और कबीर जयंती का ये संदेश तुम्हारे जीवन में भी जगमगाए और एक दिन तुम्हारी ज्योत वो आत्मा, परमात्मा से मिलकर एक हो जाए। यही तुम सबके लिए मेरी शुभ इच्छा,और शुभकामनाएँ हैं।

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