आज बुद्ध पूर्णिमा है, भगवान गौतम बुद्ध का जन्म दिवस। आज के दिन लगभग पच्चीस सौ साल पहले बुद्ध का जन्म हुआ था, जिनका नाम था सिद्धार्थ। जन्म से ही बता दिया गया था कि यह बड़ा होकर बुद्ध पुरुष या फिर कोई बड़ा चक्रवर्ती सम्राट बनेगा। तो राजा शुद्धोदन, सिद्धार्थ के पिता को एकदम झटका लगा, क्योंकि सिद्धार्थ उनकी इकलौती औलाद थी।
उन्होंने सोचा अगर यह संत बन गया तो फिर मेरा राज्य कौन संभालेगा ? तो पिता ने ठान लिया कि सिद्धार्थ को ऐसा कर देंगे की यह दुनिया की माया में पूरी तरह घुल जाए और वो कभी साधु-संत बनने का सोचे भी नहीं। समय बीतता गया। राजा शुद्धोदन बूढ़े हो गए, सिद्धार्थ उनतीस साल के हो गए। तो राजा शुद्धोदन ने अब सोचा कि इसे गद्दी दे दें। जब पिता ने अपनी गद्दी पर बिठाया, पहले दिन सिद्धार्थ गौतम निकला और उसने रास्ते में एक बीमार व्यक्ति, एक बूढ़े और एक मरे हुए व्यक्ति को देखा और अपने सार्थी से पूछा “कि क्या मैं भी बीमार, बूढ़ा होऊँगा? क्या मैं भी मर जाऊँगा”? रथ रुकवाया और उन्होंने सोचा कि अंत में अगर मर ही जाना है तो मौत के आगे क्या ? जब वो लौट आते हैं महल में, तो बाप गुस्सा करता हैI
वह रात सिद्धार्थ गौतम की महलों में आखिरी रात थी। अगली सुबह की पहली किरण के साथ ही उन्होंने महल, पत्नी और पुत्र को छोड़ दिया। अंदर तड़प लग गई थी कि यह जिंदगी क्या है? मरने के बाद जिंदगी क्या है? उस उत्तर के लिए सिद्धार्थ गौतम ने महलों को छोड़ा और भटकते, भटकते छह साल में बोधि वृक्ष के नीचे जब उन्होंने आँख बंद कर ली, खो गए अंदर, तो फिर जवाब मिलता है कि मृत्यु के आगे क्या? वो ही उन्होंने संसार को बताया। बुद्ध ने कोई भगवान की बात नहीं की,आत्मा की बात नहीं की।
यहाँ सारे वेद पुराण चीख-चीख के परमात्मा और आत्मा की बात कर रहे थे, मंदिरों में पूजाएँ पाठ चलती थीं, अगरबत्तीयाँ जलाई जा रही थीं और वहीं उनके बीच में एक शरीर उठता है जो बोलता है कि कोई भगवान नहीं, कोई आत्मा नहीं। यह सब बातों का कोई अर्थ नहीं, अपने दुख को जानो, जो सच्चाई है। भगवान को मानते हो, क्या तुमने भगवान को देखा है? तुम एक ऐसी अंधी दौड़ में चल रहे हो, जिसमें कहीं पहुँचते नहीं हैं। उन्होंने कहा, तुम दुखी हो, तो तुम यह जानो कि दुख क्यों है? मंदिरों में जाने से तेरा दुख दूर नहीं हो रहा, तो दुख की जड़ को ही पकड़ोI बुद्ध ने कोई परमात्मा की बात नहीं की। बुद्ध ने कहा, तुम्हें दुख है ना, तो तुम उसकी बात करो।
बुद्ध ने कहा, “अप्प दीपो भवः” अर्थात स्वयं अपना दीपक बनो। पर अपना दीया कैसे जलाओगे? उन्होंने कहा दुख की पहले खोज कर, दुख क्यों है? जब दुख से तेरी मुक्ति हो जाती है, दुख से मुक्ति ही अप्प दीपो भव है। तो दुख से मुक्ति कैसे हो? उन्होंने कहा, कि संसार दुख है, और दुख का कारण है। कोई भी चीज़ बिना कारण के नहीं हो सकती। कारण है तो निदान भी होगा। तो कारण को हटा दो, निदान हो गया, हल निकल आया, दुख का हल निकल आया। दुख से मुक्ति हो गई और दुख से मुक्ति ही दीये का जल जाना है। अंदर की जोत प्रकट करने के लिए, तेरी ‘मैं’ को जलाना पड़ेगा। तू कौन है? तू ‘मैं’ है, तो तेरी ‘मैं’ जले तो दीया जले; तेरी ‘मैं’ ही तेरी इच्छा का कारण है, तेरी ‘मैं’ ही तेरा दुख है। आसक्ति हटा दे, दुख खत्म, दीया जल गया, निर्वाण हो गया।
बुद्ध ने अंतिम लक्ष्य को निर्वाण कहा, जीते जी मर जाना निर्वाण, जीते जी अपने को पा लेना निर्वाण। दीपक जलने का अर्थ है, तूने जिंदगी का प्रकाश जान लिया, तूने जान लिया कि जीवन क्या है? तूने पा लिया उस जोत को, अब जीवन में कभी अंधेरा नहीं आएगा। दुख-सुख, लाभ-हानि, मान-अपमान,जन्म-मृत्यु एक समान, यही है समाधि। जहाँ सब एक समान हो जाए, उसको कहते हैं समाधि हो गई, समाधि लग गई। समाधि यानी समाधान हो गया जिंदगी का। इसलिए सत को पाना है, बुद्धत्व को पाना है और जीवन को सफल करना है ।
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