सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो से मचा हड़कंप, एक साध्वी ने दूसरी साध्वी को दी गंभीर चेतावनियां, संतों की भाषा और आचरण को लेकर उठे सवाल
हरिद्वार। सोशल मीडिया पर इन दिनों एक साध्वी का वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वह दूसरी साध्वी के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक और आक्रामक भाषा का इस्तेमाल करती नजर आ रही है। वीडियो में कथित तौर पर घर में घुसकर मारपीट करने और कपड़े उतारने जैसी धमकियां दिए जाने की बात सामने आ रही है। हालांकि वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
वीडियो में साध्वी का आरोप है कि नोएडा की एक साध्वी कुछ संतों के वीडियो प्रसारित कर उनका अपमान कर रही है। इसी कथित विवाद को लेकर साध्वी ने हरिद्वार के कुछ संतों के नाम लेते हुए उन पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। सोशल मीडिया पर सामने आए इस विवाद ने संत समाज के भीतर चल रहे कथित मतभेदों और सार्वजनिक आचरण को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन संतों और साधु-संतों से समाज संयम, शालीनता, मर्यादा और सदाचार की अपेक्षा करता है, यदि उन्हीं से सार्वजनिक मंचों अथवा सोशल मीडिया पर एक-दूसरे के खिलाफ धमकी और अपमानजनक भाषा सुनने को मिले तो इसका समाज पर क्या संदेश जाएगा?
संत समाज की पहचान भारतीय परंपरा में त्याग, तपस्या, संयम और आध्यात्मिक मार्गदर्शन से जुड़ी रही है। ऐसे में किसी भी साधु-संत या साध्वी द्वारा सार्वजनिक रूप से कथित तौर पर धमकी भरी या अभद्र भाषा का इस्तेमाल किए जाने की स्थिति में उसकी निष्पक्ष जांच और तथ्य सामने आना जरूरी है।
वहीं, वायरल वीडियो में जिन व्यक्तियों के नाम लिए जा रहे हैं, उनके संबंध में भी सोशल मीडिया पर तरह-तरह के आरोप और दावे किए जा रहे हैं। इनमें कुछ पर आपराधिक गतिविधियों, संपत्ति संबंधी विवादों और अन्य गंभीर मामलों से जुड़े होने के आरोप लगाए जा रहे हैं। उन नामों में से एक संत ने तो महाकाल की नगरी उज्जैन में अपने पद का दबाव बनाकर सरकारी भूमि पर कब्जा कर बनाया हुआ है। इससे भी मजेदार बात यह की कब्जे की जमीन पर इमारत बनाकर उस साधु ने उस इमारत को एक कथित कलमकार को उसे किराए पर दिया हुआ है।
सवाल यह कि जिस प्रकार की संतों की भाषा सुनने को मिलने लगी है और एक-दूसरे की लंगोटी खोलने में लगे हुए है, उसको देखते हुए ऐसे भगवाधारियों को संत तो कतई नहीं कहा जा सकता।
सरकार और प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल
विवाद का दूसरा पहलू शासन और प्रशासन की भूमिका को लेकर है। यदि किसी सार्वजनिक व्यक्ति के खिलाफ गंभीर आरोप सामने आते हैं या सोशल मीडिया पर धमकी अथवा आपत्तिजनक भाषा से जुड़ा वीडियो वायरल होता है तो संबंधित तथ्यों की जांच की जिम्मेदारी कानून-व्यवस्था से जुड़े तंत्र की होती है। सवाल यह है कि ऐसे मामलों में शिकायत मिलने पर क्या निष्पक्ष जांच की जाती है और आरोप सही पाए जाने पर क्या कानूनी कार्रवाई होती है?
धर्म और आस्था से जुड़े लोगों का समाज में व्यापक प्रभाव होता है। ऐसे में किसी भी व्यक्ति को भगवा वस्त्र या धार्मिक पहचान के आधार पर कानून से ऊपर नहीं माना जा सकता। साथ ही किसी व्यक्ति पर लगे आरोपों को जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने से पहले अपराध का अंतिम प्रमाण भी नहीं माना जाना चाहिए।
भगवा वस्त्र नहीं, आचरण तय करे पहचान
संत समाज के भीतर होने वाले विवादों को देखकर अब यह बहस तेज हो रही है कि किसी व्यक्ति की पहचान केवल उसके वस्त्र से होनी चाहिए या उसके आचरण से भी। भारतीय परंपरा में साधु-संतों के लिए संयम और मर्यादा को विशेष महत्व दिया गया है। ऐसे में यदि धार्मिक पहचान रखने वाले लोग ही सार्वजनिक विवादों में धमकी, अपशब्द और व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप का सहारा लेते हैं तो इससे न केवल उनकी व्यक्तिगत छवि प्रभावित होती है, बल्कि व्यापक रूप से धार्मिक संस्थाओं और परंपराओं की प्रतिष्ठा पर भी सवाल उठते हैं।
सबसे हास्यादप्रद बात यह कि सब कुछ जानने के बाद भी सरकारें ऐसे अधर्मियों के खिलाफ कोई कार्यवाही करने को तैयार नहीं है। सरकार की अपनी वोट बैंक की राजनीति ऐसे लम्पटांे पर कार्यवाही के आड़े आ जाती है। जबकि कुछ तो भगवा की आड़ में ऐसे अपराधी भरे हुए हैं कि यदि इन पर कार्यवाही की जाए तो ये जिंदगीभर जेल से बाहर नहीं आ पाएंगे। वैसे कुछ कथित भगवाधारियों के आचरण को देखते हुए सनातन और भारतीय परम्पराओं को नष्ट करने में इन्हें अग्र पंक्ति में शामिल किया जा सकता है।
जरूरत इस बात की है कि वायरल वीडियो और उसमें लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच हो, संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर मिले और यदि कोई कानून तोड़ने का दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ बिना किसी भेदभाव के कानूनी कार्रवाई की जाए। भगवा वस्त्र किसी को कानून से ऊपर नहीं बनाता और न ही किसी पर लगाया गया आरोप उसे स्वतः दोषी बनाता है।


