हरिद्वार। कनखल स्थित अद्वैत पीठ श्री सूरतगिरि बांग्ला गिरीश आनंद आश्रम में शुक्रवार को श्रावणी पर्व उल्लास एवं धार्मिक श्रद्धा के साथ मनाया गया। आश्रम के परमाध्यक्ष महामंडलेश्वर आचार्य स्वामी विश्वेश्वरानंद गिरि महाराज के पावन सानिध्य में आयोजित कार्यक्रम में वैदिक परंपराओं के अनुसार पूजा-अर्चना, यज्ञ एवं यज्ञोपवीत संस्कार संपन्न कराया गया।
कार्यक्रम के दौरान शुक्ल यजुर्वेद के ब्राह्मणों ने विधि-विधान के साथ श्रावणी पर्व मनाया। वहीं, दर्जनों बटुकों का यज्ञोपवीत संस्कार कराया गया। आचार्य शिवपूजन के नेतृत्व में बटुकों को वैदिक मंत्रोच्चार के बीच यज्ञोपवीत धारण कराया गया। इस दौरान आश्रम परिसर वैदिक मंत्रों और धार्मिक अनुष्ठानों से गूंज उठा।
इस अवसर पर उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति भी मौजूद रहे। उन्होंने श्रावणी पर्व और वैदिक संस्कारों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए संस्कृत एवं वैदिक परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता बताई।

वैदिक संस्कार जीवन को देते हैं नई दिशा : स्वामी विश्वेश्वरानंद गिरि
महामंडलेश्वर आचार्य स्वामी विश्वेश्वरानंद गिरि महाराज ने कहा कि श्रावणी पर्व भारतीय सनातन एवं वैदिक परंपरा का महत्वपूर्ण पर्व है। यज्ञोपवीत संस्कार केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि बटुक के जीवन में ज्ञान, अनुशासन, संस्कार और कर्तव्यबोध की शुरुआत का प्रतीक है।

उन्होंने कहा कि वैदिक परंपराओं में संस्कारों का विशेष महत्व है। युवा पीढ़ी को अपनी संस्कृति, वेदों और सनातन परंपराओं से जोड़ना आज के समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि वेद और संस्कृत हमारी प्राचीन ज्ञान परंपरा के आधार हैं तथा इनके संरक्षण के लिए संत समाज और शिक्षण संस्थानों को मिलकर प्रयास करने चाहिए।
स्वामी विश्वेश्वरानंद गिरि महाराज ने यज्ञोपवीत संस्कार प्राप्त करने वाले सभी बटुकों को आशीर्वाद देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की और उन्हें सदाचार, अनुशासन तथा धर्म के मार्ग पर चलने का संदेश दिया।
कार्यक्रम में आश्रम के कोठारी स्वामी उमानंद गिरि सहित आचार्य, संत-महात्मा, आश्रम के प्रबंधक एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। वैदिक मंत्रोच्चार और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ श्रावणी पर्व का समापन हुआ।


