हरिद्वार। सांसद पप्पू यादव के संसद परिसर में भगवा धारण कर चंदा चोरी का नाटक करने से कुछ संत आगबबूला हैं। हरिद्वार के संतों में भी पप्पू यादव को लेकर तीखे विरोध के स्वर सुनायी देने लगंे हैं। वहीं कुछ साधु पप्पू यादव के घर के बाहर धरना देकर बैठक गए हैं। उनका कहना है कि जब पप्पू यादव साधु बन ही गया है तो उसे अब घर में तो रहने नहीं देंगे। यदि साधु बना है तो पूरी तरह से त्याग कर साधु बने। पप्पू यादव के भगवा धारण करने पर कुछ संतों ने इसे संत समाज का अपमान बताते हुए आर-पार की लड़ाई का ऐलान किया है।
कुछ संतों का मानना है कि भगवा वस्त्र संन्यास और त्याग का प्रतीक है तथा इसे संन्यासियों के अतिरिक्त किसी अन्य को धारण नहीं करना चाहिए। उनका कहना है कि आज के समय में भगवा धारण करना फैशन और राजनीति का माध्यम बन गया है तथा नेताओं की पहली पसंद भी भगवा वस्त्र बन चुका है।
इसके साथ ही कुछ संत पप्पू यादव के विरोध में हैं तो कुछ समर्थन में भी दिखायी दिए। इसके साथ ही भगवा को लेकर एक नयी बहस भी दिखायी दी। संतों का यह भी कहना है कि वास्तविक भगवा वही है जो गेरू से रंगा हुआ हो। उनके अनुसार आज भी रामकृष्ण मिशन मठ और दक्षिण भारत के अधिकांश संन्यासी गेरुआ वस्त्र धारण करते हैं। उनका तर्क है कि फैशन के अनुरूप भगवा वस्त्र पहनना संन्यास की मूल भावना के विपरीत है। ऐसे में जो गेरुआ वस्त्र धारण नहीं करते और फैशन के कपड़े पहनते हैं वह भी साधु नहीं हो सकते। ऐसे में जो लोग भगवा वस्त्र के अपमान का आरोप लगाते हैं, वे स्वयं भी उसकी परंपरा और मर्यादा का पालन नहीं कर रहे हैं। कुछ संतों का कहना है कि जो साधु आज कोपीन धारण करने के स्थान पर आधुनिक कोपीन धारण करते हैं, उनको क्या कहा जाएगा।
कुछ संतों ने यह भी कहा कि केवल भगवा वस्त्र धारण करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके अनुरूप आचरण भी होना चाहिए। उनका आरोप है कि भगवा पहनने के बाद यदि कोई व्यक्ति मर्यादा के विपरीत आचरण करता है या दूसरों की संपत्तियों पर कब्जे जैसे कार्यों में संलिप्त रहता है, आपराधिक प्रवृत्ति में संलिप्त रहता है तो वह स्वयं भगवा का अपमान करता है।
इस संदर्भ में उन्होंने साध्वी कंचन गिरि द्वारा हाल ही में कथित भगवाधारियों पर लगाए गए आरोपों का भी उल्लेख किया। कुछ संतों का कहना है कि भगवा को लेकर जो बयानवीर बन रहे हैं, उनका स्वयं का आचरण क्या है। वहीं कुछ संतों का कहना है कि पप्पू यादव को साधु का रूप धारण न कर अन्य कोई रूप धारण करना चाहिए था। भगवा त्याग का प्रतीक है और संन्यासी के अतिरिक्त किसी को भगवा धारण नहीं करना चाहिए।
संतों का कहना है कि ऐसे लोग दूसरों के खिलाफ मोर्चा खोलने की बात करने से पहले आत्ममंथन करें। उनका कहना है कि कहावत है, वही बोलो, जिसका स्वयं जीवन में पालन करते हो। संतों के अनुसार दूसरों को उपदेश देने की अपेक्षा अपने जीवन में उन आदर्शों को आत्मसात करना अधिक महत्वपूर्ण है।


