धर्म की मंडी में विनाश की ओर बढ़ता सनातन और परंपराएं

क्या बिक रहे हैं सनातन के सर्वोच्च धार्मिक पद? धर्मनगरी से उठे बड़े सवाल”

हरिद्वार। “जब खेत की रखवाली करने वाले ही खेत खाने लगें, तब उसकी सुरक्षा की कल्पना करना बेमानी हो जाती है।” इन दिनों धर्मनगरी हरिद्वार में संत परंपरा और सनातन धर्म की प्रतिष्ठित उपाधियों को लेकर उठ रहे सवाल कुछ इसी कहावत को चरितार्थ करते नजर आते हैं। सनातन धर्म की गौरवशाली परंपराओं में अब ज्ञान, तप और त्याग की अपेक्षा धनबल का प्रभाव बढ़ता जा रहा है।


कभी कठोर तपस्या, गहन शास्त्रज्ञान और संन्यास की कसौटी पर दिए जाने वाले महामंडलेश्वर, आचार्य महामंडलेश्वर और जगद्गुरु जैसे सर्वोच्च धार्मिक सम्मान आज पहले जैसी गरिमा के साथ नहीं दिए जा रहे। इन प्रतिष्ठित पदों के चयन में योग्यता की जगह आर्थिक प्रभाव को अधिक महत्व मिलने लगा है।


पहले किसी भी संत को मंडलेश्वर या महामंडलेश्वर बनाए जाने से पूर्व अखाड़ों के वरिष्ठ संत उसकी विद्वता, शास्त्रों की समझ, तपस्या, वैराग्य और संन्यास जीवन की गहन परीक्षा लेते थे। वर्षों की साधना और समाज सेवा के बाद ही किसी संत को इस सम्मान के योग्य माना जाता था। लेकिन अब इस परंपरा में बदलाव आया है और कई मामलों में धनबल निर्णायक भूमिका निभा रहा है।


इसी प्रकार जगद्गुरु जैसी प्रतिष्ठित उपाधि को लेकर भी प्रश्न उठ रहे हैं। पारंपरिक मान्यता के अनुसार जगद्गुरु वह होता है जो अपने शास्त्रज्ञान, आचरण, तप और शास्त्रार्थ की क्षमता से समाज का मार्गदर्शन करे। सूचना चाहिए की इस पद की गरिमा से समझौता पूरे सनातन धर्म की प्रतिष्ठा का विषय है।

भगवाधारियों में अधिकांश ज्ञान की परंपरा की कीमत अब धन बल के आधार पर परखी जाने लगी है, जहां ज्ञान का नहीं धन का सम्मान किया जाने लगा है। आए दिन जगतगुरु जैसे महत्वपूर्ण पदों को रेवड़ियों की तरह बांटा जाने लगा है। महामंडलेश्वर जैसे पद तो आलू प्याज की भांति हो गए हैं। ऐसा ही कुछ हाल सर्वोच्च सनातन के सम्मानित पद शंकराचार्य का भी है। आलम यह है कि आज दर्जनों शंकराचार्य बनकर घूम रहे हैं। इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि जानने के बाद भी कुछ कथित संत और राजनेता आए दिन फर्जी शंकराचार्य की चरण वंदन करते हुए देखे जा सकते हैं।

आम जनमानस को मोह माया से दूर रहने का उपदेश देने वालों के यहां महामंडलेश्वर, जगतगुरु जैसे पद लाखों करोड़ों में बिकते हुए देखे जा सकते हैं। आलम यह है कि एक गरीब से गरीब संत के महामंडलेश्वर बनने पर कम से कम 20 लख रुपए का खर्च आता है, जबकि धनवान को यह महामंडलेश्वर बनाने वाले ऐसे नोचते हैं जैसे भूखे गिद्ध को बड़े दिनों बाद भोजन मिला हो। आचार्य महामंडलेश्वर की पदवी तो कई करोड़ तक पहुंच चुकी है। ऐसे में जगतगुरु के पद का स्वत: ही अनुमान लगाया जा सकता है।


इन हालातों में धार्मिक संस्था या अखाड़े में पदों के चयन को लेकर पारदर्शिता और योग्यता सर्वोपरि नहीं रही, तो आने वाले समय में श्रद्धालुओं का विश्वास प्रभावित हो सकता है। सनातन धर्म की वास्तविक शक्ति उसके शास्त्र, उसकी परंपरा, त्याग, तपस्या और आचरण में निहित है, न कि किसी पद या उपाधि में।

समाज से पूर्व में बहिष्कृत किया व्यक्ति धन के कारण जगतगुरु की पदवी पा जाता है। मजेदार बात यह की जो बहिष्कृत कर फर्जी बताता है, वही जगद्गुरु बनाता है। गेरुआ वस्त्र धारण करने के बाद भी जो होटल में अपनी पत्नी का जन्मदिन मनाते हैं, उनको भी जगतगुरु की पदवी से अलंकृत किया जाता है। ऐसे में सनातन को किस दिशा की ओर यह भगवाधारी ले जा रहे हैं, अनुमान लगाया जा सकता है।

जगतगुरु उसे कहा जाता था जो समस्त वसुधा का भ्रमण कर शास्त्रार्थ के द्वारा विद्वानों को पराजित कर दिग्विजय करता था, वह जगतगुरु के पद पर आसीन किया जाता था। सवाल सबसे बड़ा यह है कि सन्यास परंपरा में जो विद्वान संत हैं, यदि सनातन को बचाना है तो ऐसे संतो और धर्म परायण जनता को आगे आना होगा अन्यथा धन के लोलुप ये भगवाधारी इसी तरह से सनातन को नीलाम करते रहेंगे और सनातन की परंपराओं पर आघात करते हुए उसे विनाश के गर्त में पहुंचा देंगे।


धर्मनगरी हरिद्वार सदियों से सनातन संस्कृति, अखाड़ा परंपरा और संत समाज का प्रमुख केंद्र रही है। ऐसे में यहां से उठने वाले सवाल पूरे देश के श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित करते हैं। सवाल बड़ा है कि ऐसा क्यों हो रहा है। संबंधित संस्थाएं और अखाड़ों को इनका तथ्यात्मक उत्तर देना चाहिए, ताकि श्रद्धालुओं का विश्वास बना रहे और सनातन धर्म की गौरवशाली परंपरा अक्षुण्ण रह सके।

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