गंगा दशहरा : निर्मलता की ओर यात्रा

संसारी शरीर में जीता है और शरीर में ही मर जाता है। उसका आत्मा से कोई लेना-देना नहीं है। और जो पारब्रह्म से यात्रा होती है, वहाँ शरीर की बात ही नहीं है, वहाँ केवल अशरीर है। अशरीर को हमने शरीर में छुपी आत्मा कहा है। जो अशरीर और आत्मा पर यात्रा करते हैं, वो अपने शरीर की और अपने संबंधों की चिता जलती हुई देख लेते हैं।

तुम्हारे कितने जन्म हो गए और कितने जन्म होंगे, अगर तुम इस शरीर में ही अटके रहोगे। क्योंकि एक मनुष्य देह का जन्म व्यर्थ जाते ही तुम्हें चौरासी लाख मौतों से गुजरना पड़ता है। यहाँ कोई किसी को नहीं पूछता, कोई किसी को प्यार नहीं करता, सब ड्रामा और तमाशा है। सब केवल धंधा है। गंगा यही कह रही है क्योंकि गंगा सब कुछ छोड़कर भागकर आई और सागर में मिल गई। गंगा को रास्ते में किसी से भी कोई लेना-देना नहीं है; वो अपने सागर से मिलकर एक हो जाती है।

भागीरथ संसार के अंदर गंगा को लेकर आए। भागीरथ इक्ष्वाकु वंश के थे। जब भागीरथ को पता चला कि उनके साठ हजार पूर्वजों के शरीर ऐसे ही राख बने पड़े हुए हैं, तो उन्होंने उनका उद्धार करने के लिए तपस्या की और कपिल मुनि को प्रसन्न किया। कपिल मुनि ने कहा, “जा स्वर्ग से गंगा को लेकर आ। जब गंगा में इनकी राख और अस्थियाँ प्रवाहित होंगी, तब उनका उद्धार हो जाएगा।” तब भागीरथ गंगा को लेने गए। विष्णु जी के अँगूठे से गंगा निकली, और जब गंगा निकली तो वो बहुत तेज धारा में बह रही थी। फिर कहा गया कि गंगा को शिव की जटाओं में डाल दो, ताकि शिव की जटाएँ धारा को रोक सकें। विष्णु के अँगूठे से गंगा शिव की जटाओं में गई और वहाँ से धरती पर गंगोत्री से गंगा आई और भागीरथ के साठ हजार पूर्वजों का उद्धार किया। फिर गंगा को कहा गया, कि तू पृथ्वी पर ही रुक और संसार को संदेश दे कि वो तेरी तरह दौड़े, किसी जगह पर भी रुके नहीं, किसी संबंधों में अटके नहीं। क्योंकि अगर अटक गए तो गंदे नाले के अंदर चले जाएँगे। गंगा संसार को यही संदेश दे रही है, ध्यान रखो।

गंगा केवल कोई जल नहीं है कि तुम मुँह में डालो और निर्मल हो जाओगे! तुम्हारे अंदर गंदा नाला चल रहा है, तुम्हारे विकारों का! विकारों का अर्थ है गंदा नाला: कामवासना, क्रोध ,लोभ, मोह, और अहंकार। तुम्हारे अंदर पाँच विकार भरे पड़े हैं तो तुम्हारे अंदर गंगा क्या करेगी? कबीर कहते हैं “कबीर मन निर्मल भयो जैसे गंगा नीर।”, मतलब, गंगा की तरह मेरा मन भी अंदर से निर्मल हो गया यानी मेरे अंदर कोई विकार नहीं रहा। मैंने इस जगत को मरा हुआ देख लिया,और अंदर मेरे अब कुछ नहीं चलता, मेरा विष्णु अंदर बैठा है। तुम्हारे अंदर भी स्वयं परमात्मा बैठा हुआ है, पर तुम्हारे विकारों के कारण तुम्हारी गंगा मैली हो गई है, और तुम्हारे जन्म-मरण का कारण बन गई है।

गंगा मतलब तुम्हारे विकारों कि अंदर से छुट्टी, तुम्हारे अंदर कोई विकार ना रहे और अंदर विकार तभी नहीं रहता जब तुम जगत को पूरी तरह मिथ्या देख लेते हो। तुम्हारे अंदर की गंगा निर्मल हो सकती है, अगर तुम अपने को ‘मैं-मेरा’ से विरक्त कर दो। ‘मैं-मेरा’ से विरक्त होते ही गंगा निर्मल हो जाएगी और सागर से मिलकर एक हो जाएगी। तब तुम्हें पारब्रह्म परमेश्वर का धाम मिलता है। तो ये अंदर का सारा खेल समझना है! सारा अंदर का खेल है, बाहर का कुछ नहीं है। संत रविदास बोलते हैं, “मन होय चंगा ते कठौती विच गंगा।” मतलब,चमड़े के अंदर भी गंगा है, पर अगर तुम्हारा मन निर्मल नहीं है, तो तुम हरिद्वार में लाख स्नान कर आओ, गंगा भी तुम्हें अस्कीवार कर देगी। जन्मों से तुम मर-मर कर इस धरती पर जन्म लेकर आ रहे हो इसलिए जीवन के सत्य को जानना होगा, गंगा जैसा निर्मल बनो। शरीर कभी पवित्र नहीं होता ध्यान रखना, आत्मा ही पवित्र होती है। जिस दिन तुम्हारे विकार हट जाते हैं, तब तुम्हारी आत्मा पवित्र हो जाती है। मनुष्य जन्म की कद्र करो, क्योंकि “मनुष्य जन्म ना मिले बारंबार।” इसलिए अपने को जगाओ, अपने निर्मल रूप में आओ ताकि परमात्मा से मिलकर एक हो सको!

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