शक्ति का दमन करने वालों का अंत तय, हरिगिरि पर त्रिकाल भवंता का बड़ा हमला

ज्ञान दास और नरेंद्र गिरि के बाद अब हरिगिरि निशाने पर
शक्ति का दमन करने वालों का अंत अच्छा नहीं होता
हरिद्वार।
धर्मनगरी हरिद्वार में वर्ष 2027 में प्रस्तावित अर्द्धकुंभ को लेकर जहां प्रशासनिक और धार्मिक स्तर पर तैयारियों की चर्चा शुरू हो चुकी है, वहीं दूसरी ओर संत समाज के भीतर बढ़ती खींचतान भी अब खुलकर सामने आने लगी है। कुंभ से करीब छह माह पूर्व ही अखाड़ों और संतों के बीच मतभेदों की आहट सुनाई देने लगी है, जिसने धार्मिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।

इस नए विवाद की शुरूआत नासिक से होना बताया जा रहा है। इसी क्रम में परी अखाड़े की शंकराचार्य स्वामी त्रिकाल भवंता महाराज ने कई बड़े आरोप लगाते हुए संत समाज में चल रही अंदरूनी राजनीति पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने सीधे तौर पर श्रीमहंत हरिगिरि को निशाने पर लेते हुए कहा कि वर्ष 2027 के अर्द्धकुंभ को प्रभावित करने और कुछ संतों को किनारे लगाने की रणनीति पर अभी से कार्य किया जा रहा है।

त्रिकाल भवंता महाराज ने कहा कि संत समाज में शक्ति प्रदर्शन और दमन की राजनीति नई नहीं है, लेकिन इतिहास गवाह है कि जो भी संतों का अपमान करता है या किसी को दबाने का प्रयास करता है, उसका परिणाम अंततः अच्छा नहीं होता। उन्होंने कहा कि धर्म और सनातन परंपरा में सभी संतों का सम्मान सर्वोपरि माना गया है, लेकिन कुछ लोग व्यक्तिगत अहंकार और प्रभाव के चलते इस मर्यादा को तोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।

उन्होंने वर्ष 2015 के नासिक कुंभ का उल्लेख करते हुए कहा कि पंचवटी क्षेत्र में ध्वजारोहण कार्यक्रम के दौरान श्रीमहंत ज्ञान दास महाराज द्वारा उनके साथ अभद्र व्यवहार किया गया था। उस समय उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित करने और दबाने का प्रयास किया गया, लेकिन समय ने सबको उसका परिणाम दिखा दिया।

त्रिकाल भवंता ने कहा कि वर्ष 2021 के हरिद्वार कुंभ के दौरान भी उनके साथ भेदभाव किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि उस समय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रहे नरेंद्र गिरि ने हरकी पैड़ी पर आयोजित गंगा पूजन कार्यक्रम में उन्हें बैठने तक नहीं दिया। उन्होंने कहा कि उस घटना ने उन्हें गहरी पीड़ा पहुंचाई थी, क्योंकि कुंभ जैसे धार्मिक आयोजन में किसी संत के साथ इस प्रकार का व्यवहार उचित नहीं माना जा सकता।

उन्होंने कहा कि आज वही प्रवृत्ति फिर दिखाई दे रही है और अब श्रीमहंत हरिगिरि उसी दिशा में आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। उनका कहना था कि संत समाज में किसी भी प्रकार की तानाशाही या दबाव की राजनीति अधिक समय तक नहीं चल सकती। धर्म की शक्ति अंततः सत्य का साथ देती है और जो लोग संतों के सम्मान को ठेस पहुंचाते हैं, उन्हें समय स्वयं उत्तर देता है। ज्ञान दास और नरेन्द्र गिरि की क्या स्थिति हुई सर्वविदित है।

सूत्रों के अनुसार हाल ही में नासिक में कुछ धार्मिक बैठकों और कार्यक्रमों के दौरान मतभेद उभरकर सामने आए थे। बताया जा रहा है कि कुछ मुद्दों को लेकर तल्खी बनी, जिसके बाद से त्रिकाल भवंता महाराज के तेवर और अधिक आक्रामक हो गए हैं। हालांकि इस पूरे मामले में अभी तक श्रीमहंत हरिगिरि की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

धर्मनगरी हरिद्वार में संतों के बीच बढ़ती यह बयानबाजी अब चर्चा का विषय बनती जा रही है। धार्मिक जानकारों का मानना है कि यदि समय रहते इन मतभेदों को दूर नहीं किया गया, तो इसका असर आगामी अर्द्धकुंभ की एकता और संत समाज की छवि पर भी पड़ सकता है। कुंभ केवल आस्था का पर्व नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति और संत परंपरा की सबसे बड़ी पहचान माना जाता है। ऐसे में संतों के बीच बढ़ती दूरियां श्रद्धालुओं के बीच भी कई सवाल खड़े कर रही हैं।


अब देखना यह होगा कि यह विवाद बातचीत से सुलझता है या फिर अर्द्धकुंभ से पहले संत समाज की यह रार और अधिक गहराती है। वैसे अभी तक की शंकराचार्य त्रिकाल भवंता की जीवन यात्रा पर नजर डाले तो वह किसी भी परिस्थिति में अपने बढ़ाए कदम पीछे हटाने वाली नहीं हैं। उन्होंने श्रीमहंत ज्ञान दास और नरेन्द्र गिरि का भी डटकर मुकाबला किया था।

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