हरिद्वार/ऋषिकेश। ऋषिकेश के शीशमझाड़ी स्थित खसरा नंबर 58 की आश्रम भूमि को लेकर सामने आए विवाद में श्री महन्त गोपाल गिरी ने नगर पालिकाध्यक्ष को आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा है कि ब्रह्मलीन स्वामी रामानंद गिरी के नाम से लगभग तीन बीघा भूमि में बना आश्रम मूल रूप से ब्रह्मलीन शांति गिरी की संपत्ति थी। उन्होंने यह भूमि स्वामी रामानंद गिरी को भजन-पूजन हेतु दी थी, जबकि लगभग पांच बीघा भूमि स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती को प्रदान की गई थी।
सोमवार को दिए आपत्ति पत्र में कहा गया है कि उक्त दोनों संपत्तियां पास-पास स्थित हैं तथा शेष भूमि शांति गिरी ने अपनी पुत्री श्रीमती कृष्णा देवी पत्नी शीतल दास को दी थी। बताया गया कि धर्म सिंह से लेकर राजस्थान सेवा समिति और स्वामी रामानंद गिरी व स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती तक की भूमि शांति गिरी की ही थी।
पत्र में आरोप लगाया गया कि रत्नेश गुराह उर्फ रतनेश गिरी उर्फ रतनेश नाथ, स्वामी रामानंद गिरी को कथा के बहाने एटा ले गया, जहां कथित रूप से सल्फास देकर उनकी हत्या कर दी गई और बाद में फर्जी वसीयत तैयार कर ली गई। यह मामला न्यायालय में विचाराधीन बताया गया है।
महन्त गोपाल गिरी ने यह भी आरोप लगाया कि कनखल स्थित जगतगुरु आश्रम का एक ट्रस्टी, ऋषिकेश स्थित स्वामी राजराजेश्वर आश्रम के माध्यम से शीशमझाड़ी स्थित रामानंद गिरी आश्रम को सरकार को सौंपने का प्रयास कर रहा है, जबकि राजराजेश्वर आश्रम का इस भूमि अथवा स्वामी रामानंद गिरी से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कोई संबंध नहीं है।
पत्र में यह भी उल्लेख किया गया कि शांति गिरी के दो पुत्र थे, विश्वजीत गिरी, जिनकी मृत्यु हो चुकी है, तथा रघुनाथ गिरी, जिनके पुत्र राम गिरी हैं। रघुनाथ गिरी का भी निधन हो चुका है। आपत्ति में स्पष्ट कहा गया है कि उक्त भूमि से राजराजेश्वर आश्रम का कोई लेना-देना नहीं है।


