संगठनों का गठन, धर्म रक्षा या फिर निजी स्वार्थों की पूर्ति
हरिद्वार। वर्तमान समय में अब संत समाज में भी आमूल चूल परिवर्तन देखने को मिल रहा है। वेश भूषा में जहां आधुनिकता का समावेश दिखायी देने लगा है वहीं संत समाज में राजनेताओं की चाटूकारिता भी चरम सीमा पर देखने को मिलने लगी है। यही कारण है कि अब अधिकांश संतोें का झूकाव राजनीति की ओर बढ़ता जा रहा है।
पूर्व में धर्मसत्ता राजसत्ता का मार्गदर्शन किया करती थी, किन्तु आज धर्मसत्ता राजनीति की ईद-गिर्द घुमती दिखायी देती है। यह कहना अनुपयुक्त नहीं होगा की वर्तमान में धर्मसत्ता राजनीति की काफी हद तक बांदी बन चुकी है। यही कारण है कि आए दिन संतों का एक नया संगठन खड़ा होता दिखायी दे रहा है। यह कहना उपयुक्त होगी की जितने संत हैं उनसे कहीं अधिक संतों के विभिन्न संगठन बने हुए हैं। सभी संगठन धर्म और मर्यादाओं की रक्षा की बात करते हैं। बावजूद इसके वह स्वंय का पीड़ित ही प्रस्तुत करते हैं।
इसी के चलते बीते रोज संतों के एक नए संगठन का धर्म की नगरी हरिद्वार में गठन हुआ। जहां अखाड़ों से जुड़े संतों ने एक नयी परिषद का गठन कर दिया। अब यह परिषद उन स्थानों को चिन्हित करने का कार्य कर कब्जा करने वालों के खिलाफ कार्यवाही करेगी।
सूत्रों की मानें तो जिस परिषद का गठन किया गया, उसमें कई संत ऐसे थे जिनमें आपस में ही पूर्व में काफी खिंचतान चरम पर जा पहंुचा था। सूत्रों की मानें तो परिषद का गठन अखाड़ा परिषद को टक्कर देने के लिए किया गया। वहीं गठन के साथ ही मतभेद भी संतों के बीच पद को लेकर दिखायी दिए। सूत्रों के मुताबिक एक पद के लिए दूसरे संत का नाम घोषित कर दिए जाने के बाद दूसरे संत का मुह फूल गया। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए दूसरे संत ने स्थिति संभाली और पंथ के हिसाब से एक ही पद पर दो पदाधिकारियों को मनोनीत कर दिया गया।
बताया जाता है कि अध्यक्ष पद की माला भी दूसरे संत के गले में डालने की तैयारी थी, किन्तु संत ने होशियारी दिखाते हुए अपनी बला को झट से टाल दिया। सूत्र बताते हैं कि बैठक में मौजूद दो संतों के बीच काफी समय तक आपसी विवाद रहा। दोनों के बीच सांप-छछूंदर वाली स्थिति बनी रही। हालात यहां तक पहुंच गए थे कि दोनों के बीच एक संत के आश्रम में जमकर मल्ल युद्ध भी हुआ। जहां संतों को बीच-बचाव कर स्थिति को नियंत्रित करने में भूमिका निभानी पड़ी। आज दोनो ंके बीच दांत काटी रोटी वाली स्थिति है। सूत्रों की माने तो यह स्थिति 51 हजार की भेंट का परिणाम है। संत के आए दिन लकड़ी किए जाने से परेशान होकर दूसरे संत ने किसी अन्य के कहने पर संत के पास जाकर लिफाफे सहित माथा टेका और स्थिति सामान्य हो गयी।
यहा यह विचारणीय है की जब लिफाफे की झलक से विकराल स्थिति सामान्य हो सकती है तो फिर कब्जों की लिस्ट सामने आने पर क्या खेला हो सकता है, इसको बताने की जरूरत नहीं है। वैसे सूत्रों की मानें तो कुछ संत इस परिषद के गठन से पूर्व ही अपनी दूरियां बढ़ा चुके थे। वैसे आज तक जितनी भी समितियां, परिषद या संगठनों का गठन हुआ, उससे कुछ को छोड़कर किसी को कोई लाभ पहुंचा हो सामने नहीं आया। अब इस परिषद के गठन से धर्म, देश, समाज और खासकर आम साधु जिसे धनवान संत हीन दृष्टि से देखते हैं, उन्हें क्या फायदा होगा। क्या ये परिषदें वास्तव में धार्मिक मर्यादाओं की रक्षा कर पाएंगी, या फिर ये भी केवल शक्ति और प्रभाव के केंद्र बनकर रह जाएंगी?
आज आवश्यकता इस बात की है कि संत समाज आत्ममंथन करे और अपनी मूल भूमिका को समझे। धर्म का उद्देश्य केवल संगठन बनाना या शक्ति प्रदर्शन करना नहीं, बल्कि समाज को नैतिक दिशा देना है। यदि संत समाज इस मूल उद्देश्य से भटकता है, तो उसका प्रभाव केवल धार्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे समाज की आस्था और विश्वास पर भी पड़ेगा।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इन संगठनों के गठन से आम साधु, समाज और धर्म को क्या वास्तविक लाभ मिलेगा?
अंततः प्रश्न यही है, क्या संत समाज अपने आदर्श स्वरूप में लौट पाएगा, या फिर वह भी राजनीति और प्रतिस्पर्धा के उसी चक्र में फंसकर रह जाएगा, जिससे वह कभी समाज को बचाने का संदेश देता था?


