हरिद्वार। राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण उत्तराखंड द्वारा 12 मार्च 2026 को कुसुम कपूर के शिकायती प्रार्थना पत्र पर पारित आदेश को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। इस मामले में हरिद्वार के अधिवक्ता अरुण भदोरिया ने राज्य के प्रमुख सचिव गृह को विस्तृत आपत्ति पत्र भेजकर प्राधिकरण के आदेश पर गंभीर प्रश्न उठाए हैं।

अपने आपत्ति पत्र में अधिवक्ता अरुण भदोरिया ने कहा है कि राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण ने केवल शिकायत में किए गए कथनों पर भरोसा करते हुए आदेश पारित किया, जबकि उपलब्ध तथ्यों और साक्ष्यों का समुचित विश्लेषण नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि शिकायतकर्ता कुसुम कपूर द्वारा प्रार्थना पत्र देने के बाद आईपीएस अधिकारी जन्मंजय खंडूरी से मुलाकात की गई थी, जिसके बाद उन्होंने अपने अधीनस्थ अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे।
भदोरिया के अनुसार “आवश्यक कार्रवाई” का अर्थ यह होता है कि यदि प्रार्थना पत्र में लगाए गए आरोपों में सत्यता पाई जाए तो अभियोग दर्ज किया जाए, अन्यथा नहीं। उन्होंने कहा कि यदि प्रत्येक प्रार्थना पत्र पर सीधे मुकदमा दर्ज करने के आदेश पारित किए जाने लगें, तो इससे झूठे और निराधार मुकदमों की संख्या में भारी वृद्धि हो सकती है।
उन्होंने अपने पत्र में यह भी उल्लेख किया कि हाल ही में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी यह टिप्पणी की है कि प्रत्येक शिकायत पर स्वतः एफआईआर दर्ज करने से न्यायालयों में अनावश्यक मुकदमों की संख्या बढ़ सकती है।
अधिकार क्षेत्र पर भी उठाया सवाल
अरुण भदोरिया ने राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण के अधिकार क्षेत्र पर भी प्रश्न उठाए हैं। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड पुलिस अधिनियम 2007 के अनुसार प्राधिकरण मुख्य रूप से serious misconduct के मामलों की जांच करता है, जिनमें पुलिस हिरासत में मृत्यु, गंभीर चोट, बलात्कार या बलात्कार का प्रयास, अवैध गिरफ्तारी, मानवाधिकार उल्लंघन तथा भ्रष्टाचार जैसे मामले शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि कुसुम कपूर की शिकायत में इन श्रेणियों में से कोई भी आरोप स्पष्ट रूप से उल्लेखित नहीं है, इसलिए इस मामले में प्राधिकरण का क्षेत्राधिकार बनता ही नहीं था।
भदोरिया ने यह भी कहा कि प्राधिकरण केवल गृह सचिव और पुलिस महानिदेशक से रिपोर्ट मांग सकता है, सलाह दे सकता है या विभागीय कार्रवाई की recommendation कर सकता है, जबकि उसके आदेश binding नहीं होते।
मीडिया में बयान पर भी आपत्ति
अधिवक्ता ने अपने पत्र में यह भी उल्लेख किया कि मामले से संबंधित जांच या आदेश के बाद राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण के एक माननीय सदस्य द्वारा समाचार पत्रों में बयान दिया गया, जो निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है और इससे पूर्वाग्रह की संभावना प्रतीत होती है।
धारा 71-A का भी दिया हवाला
उन्होंने उत्तराखंड पुलिस एक्ट 2007 की धारा 71-A का हवाला देते हुए कहा कि प्राधिकरण शिकायत प्राप्त होने के बाद उसे गृह विभाग और राज्य सरकार को अग्रसारित करता है तथा सीधे संज्ञान नहीं लेता। ऐसे में प्राधिकरण द्वारा पारित आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर दिया गया प्रतीत होता है।
मामला पहले से न्यायालय में विचाराधीन
भदोरिया ने बताया कि संबंधित घटना के संबंध में पहले ही मुकदमा दर्ज किया जा चुका है और विवेचना के बाद चार्जशीट न्यायालय में प्रस्तुत की जा चुकी है। मामला वर्तमान में न्यायिक विचाराधीन है। ऐसे में प्राधिकरण का निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप जैसा प्रतीत होता है।
उन्होंने यह भी कहा कि आदेश में आईपीएस अधिकारी जन्मंजय खंडूरी की व्यक्तिगत भूमिका या किसी विशिष्ट दुराचार का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है, जबकि उनके द्वारा प्रार्थना पत्र प्राप्त होते ही आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे।
विभागीय कार्रवाई रोकने की मांग
अधिवक्ता अरुण भदोरिया ने प्रमुख सचिव गृह से मांग की है कि जब तक पूरे प्रकरण का अंतिम निस्तारण न हो जाए, तब तक किसी भी अधिकारी के विरुद्ध कोई प्रतिकूल विभागीय कार्रवाई न की जाए और मामले में प्रस्तुत सभी तथ्यों पर समुचित विचार किया जाए।
यह मामला सामने आने के बाद राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण के आदेश को लेकर प्रशासनिक और कानूनी हलकों में चर्चा तेज हो गई है।


