परंपरा, अधिकार और धार्मिक मर्यादा, नियुक्ति प्रक्रिया पर उठे गंभीर प्रश
हरिद्वार। सनातन धर्म की शंकराचार्य परंपरा को लेकर देशभर में नया विवाद खड़ा हो गया है। जूना अखाड़ा द्वारा स्वामी चक्रपाणि महाराज को “जगद्गुरु” व स्वामी राजराजेश्वराश्रम को बद्रीनाथ पीठ के शंकराचार्य की उपाधि दिए जाने के बाद संत समाज और धार्मिक विद्वानों के बीच तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कई संतों ने इस निर्णय को परंपरा के विपरीत बताते हुए इसकी वैधता पर सवाल उठाए हैं।
क्या अखाड़ा बना सकता है शंकराचार्य?
धार्मिक परंपराओं के जानकारों का कहना है कि आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित मठों में शंकराचार्य की नियुक्ति गुरु-शिष्य परंपरा और मठ की आंतरिक प्रक्रिया से होती है। आलोचकों का दावा है कि यह “धार्मिक उपाधि” मात्र हो सकती है, जबकि शंकराचार्य पद परंपरागत उत्तराधिकार से निर्धारित होता है। कई संतों ने प्रश्न उठाया कि क्या अखाड़ों को शंकराचार्य नियुक्त करने का अधिकार प्राप्त है।
ज्योर्तिमठ विवाद से जोड़कर देखी जा रही टाइमिंग
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़े कानूनी मामलों और आरोपों को लेकर चर्चाएं जारी हैं। संत समाज के कुछ वर्गों का आरोप है कि घोषणा की टाइमिंग संदेह पैदा करती है, हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
टाइमिंग के कारण संदेह इसलिए पैदा हो रहा है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का मामला कोर्ट में विचाराधीन है। उनकी गिरफ्तारी की अटकलें लगाई जा रही थी, किंतु कोर्ट ने उन्हें राहत दे दी। जगद्गुरु और शंकराचार्य की घोषणा, वह भी उस शंकराचार्य की जो अपने को पहले से ही शारदा पीठ का शंकराचार्य कहता हो, उसकी घोषणा बद्रीनाथ पीठ के शंकराचार्य के नाम से करने का औचित्य क्या। चर्चा है कि यदि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को गिरफ्तार कर लिया जाता तो बद्रीनाथ पीठ की आड़ लेकर इन्हें वहां का शंकराचार्य घोषित कर दिया जाता।
चर्चा है के जिस अखाड़े ने बद्रीनाथ पीठ के शंकराचार्य की घोषणा की उसे घोषणा का अधिकार ही नहीं है। घोषणा करनी थी तो उस अखाड़े के पदाधिकारी को करनी चाहिए थी, जिस अखाड़े के कथित शंकराचार्य महामंडलेश्वर हैं और अपने को शंकराचार्य कहते हैं। चर्चा है कि यह घोषणा संयोग नहीं बल्कि प्रयोग था, किंतु प्रयोग फेल हो गया।


