हरिद्वार। देशभर में धार्मिक परंपराओं, अखाड़ों की मान्यता तथा शंकराचार्य पद को लेकर एक बार फिर विवाद गहराता दिखाई दे रहा है। संत समाज के कुछ वर्गों ने कथित रूप से “फर्जी शंकराचार्य” और “स्वयंभू जगतगुरु” बनाए जाने पर गंभीर आपत्ति जताई है तथा इसे सनातन परंपरा के विरुद्ध बताया है।
श्री महंत गोपाल गिरी महाराज का कहना है कि शंकराचार्य की उपाधि अत्यंत प्राचीन एवं मर्यादित परंपरा से जुड़ी हुई है, जिसे किसी भी संस्था या व्यक्ति द्वारा मनमाने ढंग से प्रदान नहीं किया जा सकता। उनका दावा है कि आदि शंकराचार्य (अभिनव शंकराचार्य) का जन्म सन् 789 ईस्वी में हुआ तथा सन् 821 ईस्वी में उनका ब्रह्मलीन होना हुआ। उस कालखंड में केवल तीन प्रमुख सन्यासी अखाड़ों की परंपरा विद्यमान थी, जिनसे कुंभ मेले की मूल व्यवस्था जुड़ी मानी जाती है।
बताया कि सर्वप्रथम सन् 547 ईस्वी में श्री शंभू पंचदशनाम आवाहन नागा सन्यासी अखाड़ा, सन् 646 ईस्वी में श्री शंभू पंचायती अटल नागा सन्यासी अखाड़ा तथा श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी नागा सन्यासी परंपरा स्थापित हुई। संतों के अनुसार कुंभ मेले के शाही स्नान की पारंपरिक व्यवस्था भी इन्हीं तीन अखाड़ों के क्रम से निर्धारित की गई थी, जिसमें अलग-अलग स्नानों में अग्रक्रम बदलता था।
विवाद का एक अन्य पक्ष कथित अखाड़ा परिषद को लेकर भी सामने आया है। आरोप लगाया है कि परिषद का नाम लेकर समाज में भ्रम फैलाया जा रहा है और धार्मिक परंपराओं की गलत व्याख्या की जा रही है। उनका कहना है कि कई व्यक्ति बिना वैदिक परंपरा, सन्यास दीक्षा या मान्य अखाड़ों से संबंध के स्वयं को धार्मिक पदों से जोड़ रहे हैं।
मां मनसा देवी ट्रस्ट को लेकर भी प्रश्न उठाए गए हैं। कहा कि यह ट्रस्ट सन् 1963 में वसीयत के आधार पर गठित हुआ था, जिसमें केवल चार ट्रस्टी — लक्ष्मीनारायण गिरी (आनंद अखाड़ा), पंडित अंबादत्त, ठाकुर मेवाराम तथा राम सनेही गिरी गोस्वामी — को शामिल किया गया था। उनका दावा है कि मनसा देवी एवं चंडी देवी मंदिरों की परंपरा गिरी गोस्वामी संप्रदाय से जुड़ी रही है और अन्य संप्रदायों का इससे कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं बताया जाता।
इसके अलावा जूना अखाड़े की संरचना को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। कहाकि जब सन् 1940 में अखाड़ा पंजीकृत हुआ था तब 17 सदस्य थे और सन् 2016 तक भी सदस्य संख्या वही रही। उनके अनुसार उस संरचना में “संरक्षक” नाम का कोई पद नहीं था, इसलिए स्वयं को संरक्षक बताना परंपरा के विपरीत बताया जा रहा है।
समाज के प्रतिनिधियों ने मांग की है कि धार्मिक पदों, अखाड़ों की मान्यता और शंकराचार्य उपाधि से जुड़े मामलों में स्पष्टता लाई जाए, ताकि समाज में भ्रम और विवाद की स्थिति समाप्त हो सके।
धार्मिक विद्वानों का मानना है कि ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर संवाद और ऐतिहासिक तथ्यों की निष्पक्ष समीक्षा आवश्यक है, जिससे सनातन परंपराओं की गरिमा बनी रहे और सामाजिक सौहार्द कायम रहे।


