एक दिन में निपट सकता है अखाड़ों का विवाद!, बशर्ते……

हरिद्वार। दो गुटों में बंटी अखाड़ा परिषद का विवाद एक दिन में निपट सकता है। इसके लिए कुछ को व्यक्तिगत स्वार्थ और पद के मोह को त्यागना पड़ेगा। अखाड़ा परिषद के दो गुटों में बंटने का मुख्य कारण की पद की लालसा और व्यक्तिगत स्वार्थ की राजनीति है। अखाड़ा परिषद के दो गुटों में बंटने के कारण सनातन की जग हंसायी भी हो रही है। सूत्रों का कहना है कि यह सब केवल एक व्यक्ति के कारण ही हो रहा है।

अखाड़ा परिषद के नियमों के मुताबिक अखाड़ा परिषद तभी पूर्ण होती है जब उसमें चार सम्प्रदायों संन्यायी, बैरागी, उदासी और निर्मल शामिल हों। यदि संन्यासी परिषद का अध्यक्ष होता है तो अन्य तीन सम्प्रदाय के संतों में से एक को महामंत्री बनाया जाता है। यदि तीनों सम्प्रदायों में से एक अध्यक्ष है तो संन्यासी महामंत्री होता है, किन्तु एक परिषद में अध्यक्ष और महामंत्री दोनों की सन्यासी हैं और अन्य तीन सम्प्रदायों के संतांे का समावेश नहीं है।

अखाड़ा परिषद में केवल अखाड़ों के पदाधिकारियों को ही परिषद के चुनावों में वोट डालने और पदाधिकारी बनने का अधिकार है। बावजूद इसके एक संत ऐसे हैं जो अखाड़े में पदाधिकारी नहीं हैं और परिषद के महामंत्री बने हुए हैं। इस लिहाज से इस अखाड़ा परिषद को सही नहीं कहा जा सकता। यदि बात बहुमत की करें तो बीते रोज मेला अधिकारी के साथ हुई संतों की बैठक में केवल पांच अखाड़े ही नजर आए। उसमें भी बड़ी बात यह की एक अखाड़े से तो कोई पदाधिकारी दिखायी ही नहीं दिया।

सूत्रों की मानें तो सभी अखाड़ों के एक होने में एक दिन का भी समय नहीं लगेगा। इसके लिए केवल व्यक्तिगत स्वार्थ और पद के लोभ का त्याग करना होगा। दोनों अखाड़ा परिषद अपनी कार्यकारिणी भंग करें और नए सिरे से चुनाव कराएं। जो पदाधिकारी बनना चाहता है वह मैदान में ताल ठोके। किन्तु एक महाशय ऐसे हैं, जो किसी भी कीमत पर पद को छोड़ना नहीं चाहते। उन्हें ताउम्र अध्यक्ष या महामंत्री बने रहना है। परिषद के नियम के मुताबिक जब कोई पदाधिकारी अखाड़े में किसी पद पर है ही नहीं तो वह अखाड़ा परिषद का पदाधिकारी कैसे बन सकता है और चुनाव में कैसे हिस्सा ले रहा है। किन्तु एक परिषद में ऐसा हो रहा है। यही कारण है कि सभी 13 अखाड़े एक नहीं हो पा रहे हैं। केवल एक व्यक्ति के कारण यह फजीहत का खेल चल रहा है।

बड़ा सवाल यह कि आखिर सब कुछ त्यागकर बाबा बनने के बाद पद और निजी स्वार्थ का क्या कारण है। नीति मार्ग का अनुसरण करने का उपदेश देने वाले आखिर किस कारण से नियमों को ताक पर रखकर नियम विरूद्ध कार्य कर रहे हैं और स्वंय को श्रेष्ठ बता रहे हैं।
सूत्रों की मानें तो यदि एक व्यक्ति को परिषद से दूर कर दिया जाए तो एक दिन में मामला सुलट सकता है, किन्तु त्यागी महात्मा लोभ और मोह का त्याग करने के लिए तैयार नहीं हैं। ऐसे में कोई अखाड़ा परिषद के नियम की जानकारी ले ले तो सोचिए क्या इज्जत रह जाएगी। सूत्रों की मानें तो जब तक नियम विरूद्ध कार्यप्रणाली का त्याग नहीं किया जाता जब तक सभी अखाड़ों का एक होना असंभव है।

वहीं बात यदि परिषद के बहुमत की करें तो यह पांच-आठ पर आकर रूकता है। बीते रोज मेला अधिकारी संग संतों की बैठक में बहुमत स्पष्ट भी हो गया। वैसे भी पांच से छह या सात होना नामुमकिन है। इसके कई कारण है। पहला प्रमुख कारण बैरागी अखाड़े हैं, जहां संतों की केकैई ने अपना बहुमत बढ़ाने के लिए एक बैरागी अखाड़े के श्रीमहंत का हटाने के लिए कार्य योजना पर काम शुरू किया, किन्तु वहां भी उन्हें मुंह की खानी पड़ी। इसके साथ प्रयागराज कुंभ मेले में श्रीमहंत राजेन्द्र दास महाराज के साथ की गयी अभद्रता ने बैरागी संतों को एकजुट कर दिया, जिस कारण वे अपना समर्थन दूसरी परिषद को नहीं दे सकते।
वहीं निर्मल अखाड़ा भी अपना समर्थन कतई नहीं दे सकता। कारण की निर्मल अखाड़े के विवाद में परिषद से जुड़े अखाड़े से संबंध रखने वाले एक वरिष्ठ संत ने निर्मल अखाड़े के विपक्षी गुट को हवा देने का काम किया। इतना ही नहीं करीब दो वर्ष पूर्व निर्मल अखाड़े के श्रीमहंत ने अहमदाबाद गुजरात में आयोजित एक बैठक में केन्द्रीय मंत्री के समक्ष एक संत का नाम लेकर अपनी हत्या तक करवा देने का आरोप लगाया था। इस कारण से निर्मल अखाड़े का टूटना भी मुश्किल है।
वहीं उदासीन बड़ा अखाड़ा भी दूसरी परिषद में नहीं जा सकता। हालांकि एक बार दूसरे गुट में जाने की चर्चाए सामने आईं थी, किन्तु हाल ही में नासिक में कुंभ मेले के लिए भूमि पूजन में अखाड़े के श्रीमहंत रघुमुनि महाराज हो आमंत्रित कर अखाड़े के संतों के पारे को सातवें आसमान पर चढ़ा दिया है। ऐसे में उदासीन बड़े अखाड़े का भी पास पलटना नामुमकिन है। जबकि नया उदासीन अखाड़ा पूर्व में ही अपनी प्रतिबद्धता को दोहरा चुका है। ऐसे में संख्या पांच से आगे बढ़ती दिखायी नहीं देती।
सूत्रों की मानें तो जब तक संतों की केकैई का प्रभाव अखाड़ा परिषद में बना रहेगा तब तक ऐका होना असंभव है।

बहरहाल कुंभ मेला दिव्य व भव्य होगा। इसके लिए सभी अखाड़ों के संतों की एकराय है। किन्तु इस मामले को कुछ लोग जानबूझकर हवा देने का कार्य भी कर रहे हैं। कुछ ऐसे भी हैं, जो मेला अधिकारी के कार्यों में रोड़ा अटकाकर उन्हें किसी भी प्रकार से हतोत्साहित करना चाहते हैं। इनमें कोई संत नहीं बल्कि उनके अपने ही बताए जा रहे हैं।

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