श्रद्धा और सबुरी ही है पूर्णता का मार्ग

भक्ति मतलब ज़िंदा भगवान की तड़प! मिथ्या भक्ति में भगवान तो नहीं मिलेगा, आखिरी में भी वही मूर्ति मिल जाएगी, बस! तुम्हें सूरत को पाना है, ना की मूरत को। तुम देखो तुम्हारी भक्ति कहाँ खड़ी है? क्या तुम अभी भी हाथ जोड़कर मूरत के आगे खड़े हुए हो? कोई कहता है कि मैं हर महीने शिर्डी जाता हूँ, पर उसके अंदर शिर्डी के साईं बाबा की श्रद्धा तो होती नहीं! बाबा फकीरी में रहते थे, रोटी, पानी में भिगोकर खाते थे और तुम्हें महल चाहिए। तुम उनसे माँगने जाते हो कि मेरी कमाई बढ़ा दो। रात को जो बचा होता था, साईं बाबा उसको भी आग लगा देते थे और जो उनके पास आता था उसे राख देते थे।

आखिर में उनके पास भिक्षा से माँगे हुए जो पैसे बचते थे, उसकी वो लकड़ी लाते थे और जला देते थे। उनका प्रसाद ही राख होता था और लोग सोचते हैं कि शरीर की बीमारी दूर करने के लिए बाबा वो राख देते थे। वो राख इसलिए देते थे कि तुम्हें पता चले कि इसकी तरह तुम भी एक दिन राख हो जाओगे। इससे पहले कि तुम राख हो जाओ, तुम परमात्मा के लिए श्रद्धा ले आओ।


श्रद्धा का अर्थ क्या है? भक्ति! भक्ति का अर्थ क्या है? भक्ति का अर्थ है जहाँ पर कि प्रेम की सुनामी हो जाती है। संसार में प्रेम दो के बीच में होता है, मैं और तुम! मैं तुमसे प्रेम करता हूँ। पर उस प्रेम की सुनामी में मैं और तुम दोनों गिर जाते हैं, वहाँ सिर्फ प्रेम रह जाता है। मैं और तुम जब दोनों हट जाते हैं, तो प्रेम सर्व के लिए हो जाता है। सर्व के लिए प्रेम ही है भक्ति। क्या तुम्हारे अंदर प्रेम की सुनामी है? प्रेम तब आता है, जब तुम्हारे अंदर किसी के लिए पूरा विश्वास हो जाता है।

पूरा विश्वास तभी होता है जब तुम्हारे अंदर किसी के लिए संदेह खत्म हो जाते हैं। जब तुम्हारे अंदर संदेह भरे होंगे तो तुम्हारे अंदर पूरा प्रेम कैसे आएगा? तुम्हारा विश्वास कैसे पूरा होगा? जब प्रेम की परिपूर्णता आ जाती है, उसको श्रद्धा कहते हैं, और जब श्रद्धा के साथ सब्र आ जाता है, तो भक्ति हो जाती है।


श्रद्धा के साथ सब्र और इंतज़ार होना चाहिए। ये शबरी की भक्ति और सब्र था कि एक दिन श्री राम ज़रूर आएँगे। वो रोज़ चख कर झूठे मीठे बेर श्री राम को खिलाने के लिए रखती थीं कि कहीं बेर खराब तो नहीं हैं, स्वाद तो ठीक है; रामकृष्ण परमहंस भी माँ काली को पहले ख़ुद चखकर प्रसाद खिलाते थे। जिस दिन तुम भगवान को झूठा भोग लगा सकोगे, उस दिन समझ लेना कि तुममें भक्ति है। लोग मूर्ति को भोग लगाते हैं, पर यह नहीं देखते कि फीका है, या खट्टा है; बूंदी पुरानी है, या नकली है! लोग सोचते हैं कि मूर्ति ही तो है, क्या फर्क पड़ रहा है?


परमात्मा ने तुम्हारी जन्मों से इंतज़ार की है, अब तुम भी उनका इंतज़ार करो, मोहब्बत की है तो थोड़ा सब्र भी करो। जितनी जल्दी तुम्हें है, उतनी परमात्मा को भी जल्दी है। सब्र करो, श्रद्धा के साथ सब्र ही पूर्ण भक्ति है। पूर्ण भक्ति का अर्थ ही है श्रद्धा और सबुरी! यही खेल है और इसी को समझना है। तभी उस पूर्णता को पाओगे और तुम्हारी ये यात्रा सफल होगी।


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