हैप्पी होली का क्या मतलब है ? कि अब तक जो भी “हो-ली” यानी जो भी हो लिया अच्छा हुआ, सब मंगल है, कोई शिकायत नहीं ! जो होना था, हो गया ! इस संसार में कुछ भी ऐसा नहीं हो रहा जो पूर्व निर्धारित नहीं है, हर एक चीज पूर्व निर्धारित है । सब कुछ परमात्मा का है, उस रचयिता का है तो फिर बुरा कैसे होगा । इसलिए जो हो लिया, वो कुछ भी बुरा नहीं था । अब तक जो भी अंदर किसी के लिए द्वेष या कुछ भी था, सब क्षमा; अंदर से खाली, ब्लैंक।
इसका मतलब है होली सफल हो गई । जो भी उत्सव भगवता या भगवान से जुड़ा है उसके पीछे एक बड़ा संदेश होता है । मेरे साथ किसी ने कुछ बुरा किया, मेरे साथ किसी ने कुछ अच्छा किया; स्वीकार है। अगर तू आज अपने अंदर से संसार का सब कुछ खाली कर दे यानी कोई राग नहीं, कोई द्वेष नहीं तो हैप्पी हो ली । इसी को कृष्ण भगवान कहते हैं “जो हुआ अच्छा” इसी को गुरु नानक देव कहते हैं “हुकम रजाई चलना” रजा में राज़ी।इसी को जीसस कहते है “टोटल एक्सेप्टेबिलिटी”। सबने वही कहा है । जब तू ये जीवन में समझ जाता है तो तेरे जीवन की रोशनी, तेरी ज्योत जगमगा जाती है । अगर तू नहीं समझा तो तेरा जीवन फिर से आगे बढ़ जाएगा और तेरा कभी भी परमात्मा से मिलन नहीं होगा, इसलिए तुझे कहीं ना कहीं अपने को खाली करना पड़ेगा ।
तेरे अंदर जब तक कचरा है, कोई शिकायत है, ईश्वर तेरे से खफा रहेंगे, कभी अंदर नहीं आएँगे, कभी नहीं। तू बाहर कितनी भी सफाई कर, कुछ फायदा नहीं है । इसलिए तुझे अपने अंदर का सिंहासन सजाना पड़ेगा, जिंदा परमात्मा को अंदर लाना पड़ेगा । इसलिए अगर हम किसी त्योहार पर जीवन का संदेश ले लेंगे तो फिर जीवन सफल हो जाएगा ।
रंगों का त्योहार है, सारे रंग उसी के हैं, सारे खेल उसी के हैं। सारे रंगों को जैसे तू स्वीकार करता है ऐसे ही संसार को स्वीकार कर । स्वीकार करो क्योंकि तूने कहीं माया के उन रंगों को अंदर कर लिया है जो कि बाहर होने चाहिए, रंग बाहर ही अच्छे लगते है अंदर नहीं। अंदर तो एक ही है वो श्वेत। रंग है माया! अलग-अलग रूप, अलग-अलग रंग, अलग-अलग रेख खेलने के लिए मिला है , पर खेल को तू असली मान बैठा । श्वेत हो अंदर, रंग बाहर हो तो जीवन मौज में रहेगा , हैप्पी रहेगा। देखा ना आज होलिका और हिरण्यकश्यप भक्ति को खत्म करने की कितनी कोशिश कर रहे हैं। प्रहलाद भक्त हुआ, भक्ति में डूबा हुआ; हिरण्यकश्यप पिता अपने बेटे को मारने के लिए यानी भक्ति को खत्म करने के लिए कितनी कोशिश करता है; पर अंत में जीत किसकी होती है ? भक्त की ! तो ये सारा जो खेल है, ये समझना है । भक्त यानी अंदर सिर्फ और सिर्फ भगवान चलते थे, सिर्फ भगवान, रचयिता। तो अगर इस भक्ति को तू चाहता है तो तुझे अपने अंदर से खाली होना पड़ेगा और खाली होते ही तू स्थिर हो जाता है।
स्थिर मन है ब्रह्म, अस्थिर मन है संसार। तो आज का ये होली का पर्व एक ही संदेश देता है कि अब तक जो भी तेरे अंदर किसी पदार्थ, किसी स्थान से कोई अटैचमेंट है या द्वेष है या किसी इंसान से तेरा अटैचमेंट है या द्वेष है तो तू सब को क्षमा कर दे, ब्लैंक तो हो ली। तो अपने अंदर आज तुम्हें यही पक्का करना है और एक नई शुरुआत करनी है, बाहर माया के रंगों में खेलो पर अंदर कोई रंग ना जाने दो क्योंकि अंदर तो श्वेत रंग ही चलेगा। बाहर सफेद कपड़े पहनने से कुछ नहीं होगा, कुछ भी आडंबर नहीं, अंदर से श्वेत हो जाओ, निर्मल। “कबीर मन निर्मल भयो जैसे गंगा नीर, आगे पीछे हरि फिरे कहत कबीर कबीर” तो भगवता तुम्हारे अंदर निवास करेगी और तुम्हारा ये जन्म सफल हो जाएगा ।
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