पांच की ढपली पर 13 को नचाने का दावा, कुंभ को लेकर अलाप रहे अपना राग

बिना बहुमत के बन रहे शहंशाह
हरिद्वार। अर्द्ध कुंभ को कुंभ मेला बताकर भव्य आयोजन करने की रूपरेखा बनाने के लिए आज मेला अधिकारी ने सभी अखाड़ों के संतों की बैठक सीसीआर में बुलायी। बैठक में 13 में से केवल पांच अखाड़ों के प्रतिनिधि ही शामिल हुए। इससे कुंभ की सफलता और संतों की एकजुटता के दावों की हवा निकलती दिखायी दी। वहीं अखाड़ा परिषद का सर्वे सर्वा होने का दंभ भरने वालों को भी प्रशासन की मौजूदगी में आईना दिख गया। बैठक में संतों (अखाड़ों) की मौजूदगी में अभी तक पांच की ढपली पर 13 को नचाने का दावा करने का असली सच मेला प्रशासन के समक्ष उजागर हो गया। बिना बहुमत के शहंशाह बनने वालों की कलई खुलकर सामने आ गयी।

वहीं दूसरी ओर दावा किया जा रहा है कि बैरागियों ने अपनी अलग परिषद का गठन किया हुआ है और उदासीन व निर्मल सम्प्रदाय की भी परिषद गठित है। ऐसे में किसी परिषद का कोई औचित्य नहीं। किन्तु यहां यह विचारणीय है कि अखाड़ा परिषद का वजूद 13 अखाड़ों और षडदर्शन साधु समाज के बिना शून्य है। अखाड़ा परिषद तभी मान्य होती है जब उसमें 4 सम्प्रदाय और 13 अखाड़ों के संतों को प्रतिनिधित्व हो, किन्तु यहां तो अपनी ढपली अपना रोग अलापने का कार्य किया जा रहा है।

बैठक में पांच अखाड़ों के संतों की मौजूदगी ने यह साबित कर दिया है कि संतों के बीच सब कुछ ठीक नहीं है। हालांकि बैठक में जो संत शामिल हुए उनमें से कुछ तो इसलिए पहुंचे की यह चर्चा थी कि मुख्यमंत्री स्वयं बैठक में शिरकत करेंगे, किन्तु ऐसा नहीं हुआ और उनके अरमानांे पर पानी फिर गया। जब आए थे तो बैठक में पहुंचना भी जरूरी हो गया था, तो वे भी पहंुच गए।

वैसे देखा जाए तो कुंभ और अखाड़ा परिषद का कोई विशेष औचित्य नहीं है। कुंभ आदि पर्वों को लेकर प्रशासन द्वारा बुलायी गई बैठकों में किसी को भी अध्यक्ष या महामंत्री के कारण आमंत्रित नहीं किया जाता। वहां प्रत्येक अखाड़े से अखाड़े के दो प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया जाता है। अब यह अखाड़ों के पदाधिकारियों पर निर्भर करता है कि वह बैठक में किसे सम्मलित होने के लिए भेजें। वहां अध्यक्ष या महामंत्री की हैसियत से किसी को तवज्जो नहीं दी जाती। इतना ही नहीं बैठक में अखाड़ों के संतों के बैठने का भी प्राटोकॉल निर्धारित होता है। जिस प्रकार जिस कुंभ में स्नान का क्रम होता है, ठीक उसी क्रम से संतों को बैठक में बैठने के लिए स्थान का निर्धारण किया जाता है। ऐसे में आगे बैठने वाला न तो बड़ा हो जाता है और न ही पीछे बैठने वाला छोटा।

बहरहाल बैठक का जो मंजर देखने में आया उसको देखते हुए बहुमत के दावे हवा हवाई नजर आए। यदि यह भी मान लिया जाए की उदसीन, निर्मल व बैरागी संतों ने अपनी परिषदों का गठन कर लिया है तो भी उनको बैठक में सम्मलित होना चाहिए था, किन्तु इसका कारण बड़ा नजर आ रहा है। आज के हालातों को देखते हुए कहा जा सकता है कि अखाड़ा परिषद में पांच-आठ का खेल जारी है। जिस प्रकार संतों के तेवर और संतों की राजनीति का रूख नजर आ रहा है, उसमें आठ का आंकड़ा लम्बे समय तक रहने वाला है।
वैसे मेला प्रशासन और सरकार कुंभ के आयोजन को दिव्य और भव्य बनाने की दिशा में संजीदगी से कार्य कर रहे हैं। किन्तु यदि कुंभ की दिव्यता और भव्यता में ग्रहण लगता है तो उसके एकमात्र दोषी संतों के बीच चल रही अहम् और सर्वे सर्वा बनने की होड़ ही होगी।

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