भगवा की आड़ में ‘लिफाफा संस्कृति’! भंडारों में बिन बुलाए पहुंचने वाले संतों की चर्चा तेज

भंडारे का बुलावा नहीं आया तो फोन घुमाया, ‘आ जाइए’ सुनते ही गाड़ी दौड़ाई!

हरिद्वार। भगवा रंग जितना पवित्र माना जाता है, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी भी उसके साथ जुड़ी है। लेकिन संत समाज के बीच कभी-कभी ऐसी तस्वीरें भी चर्चा का विषय बन जाती हैं, जिन्हें देखकर सवाल उठता है, भगवा अब त्याग की पहचान है या ‘हर जगह मौजूद रहने’ का पास?
विडंबना यह है कि इस ‘भंडारा संस्कृति’ में कुछ ऐसे नाम भी चर्चा में रहते हैं, जो स्वयं को बड़े संत अथवा मंडलेश्वर के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

हरिद्वार में आश्रम और अखाड़े हैं तो भंडारे भी खूब होते हैं। और भंडारा हो तो श्रद्धालुओं के साथ कुछ ऐसे ‘विशेष मेहमान’ भी दिखाई दे जाते हैं, जिनके लिए शायद निमंत्रण की जरूरत ही नहीं पड़ती।

बस खबर मिली-‘आज यहां भंडारा है।’
फिर क्या… गाड़ी स्टार्ट, मोबाइल जेब में और महाशय कुछ ही देर में आयोजन स्थल पर!
निमंत्रण की जरूरत नहीं, बस खबर पहुंचनी चाहिए।
कहने को संत समाज त्याग और वैराग्य का प्रतीक है, लेकिन चर्चाओं में रहने वाले कुछ भगवाधारियों का कथित ‘भंडारा कैलेंडर’ देखकर लगता है कि इनकी आध्यात्मिक दिनचर्या कुछ अलग ही है।
सुबह उठते ही पहला सवाल- आज भंडारा कहां है?
निमंत्रण मिला तो सोने पर सुहागा। नहीं मिला तो आयोजक को फोन।
‘सुना है आपके यहां भंडारा है… हमें तो बताया ही नहीं!’
आयोजक ने संकोच में कह दिया-‘महाराज, आप आ जाइए।’
बस फिर क्या था। निमंत्रण पत्र भले न आया हो, लेकिन ‘मौखिक आमंत्रण’ मिलते ही वीआईपी एंट्री पक्की!

नामकरण हो या शादी, गृह प्रवेश हो या तेरहवीं… लिफाफा जहां, महाराज वहां?
धर्मनगरी में यह सवाल भी उठता है कि क्या कुछ लोग हर उस आयोजन में पहुंचने की कला में माहिर हो गए हैं, जहां सम्मान, दक्षिणा या लिफाफे की संभावना हो?

नामकरण हो-हाजिर।
शादी हो-हाजिर।
गृह प्रवेश हो-हाजिर।
तेरहवीं हो-हाजिर।
वार्षिकी हो-हाजिर।
और भंडारा हो तो फिर पूछना ही क्या!
ऐसे में भक्त भी सोचने लगते हैं-महाराज जी को बुलाया है या ‘उपस्थिति दर्ज कराने’ का संदेश चला गया है?

श्रीचंद्र जयंती पर फिर सजेंगे भंडारे, अब देखना कौन-कौन पहुंचेगा

उदासीन परंपरा से जुड़े आश्रमों और अखाड़ों में श्रीचंद्र जयंती के अवसर पर भंडारों का सिलसिला शुरू होने जा रहा है। जाहिर है, संतों और श्रद्धालुओं की भीड़ जुटेगी। लेकिन इस बार चर्चा का विषय प्रसाद की थाली से ज्यादा ‘बिन बुलाए मेहमानों’ की मौजूदगी हो सकती है। क्योंकि कुछ चेहरों को देखकर लोग पहले ही अंदाजा लगाने लगते हैं।
‘भंडारा यहां है तो महाराज जी भी यहीं होंगे!’

आज गाली, कल गले मिलना… आखिर राज क्या है?
सबसे बड़ा सवाल उन कथित संतों-मण्डलेश्वरों की कार्यशैली पर उठता है, जिनके बारे में कहा जाता है कि आज किसी के खिलाफ मोर्चा खोलते हैं और कल उसी के साथ खड़े होकर जयकारा लगाते दिखाई देते हैं। मजेदार बात यह कि घूसें खाने के बाद भी आज पिटने वाले की गोद में मण्डलेश्वर बैठे दिखायी देते हैं।

आज विरोध।
कल समर्थन।
आज आरोप।
कल गुणगान।
आज दूरी।
कल उसी की गाड़ी में सफर!
आखिर ऐसा कौन सा आध्यात्मिक ज्ञान है, जो इतनी तेजी से विचार बदलने की शक्ति देता है? धर्मनगरी के लोग इसे अपने-अपने तरीके से समझते हैं। कोई इसे व्यवहार-कुशलता कहता है तो कोई ‘मौकापरस्ती की साधना’।

लिफाफे का वजन बढ़ा तो विचार भी बदल गए?

सबसे तीखा सवाल यहीं है। यदि किसी व्यक्ति की निष्ठा व्यक्ति, संस्था या मुद्दे के बजाय कथित आर्थिक लाभ से तय होने लगे तो फिर भगवा वस्त्र पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

किसी के पक्ष में धरना।
किसी के खिलाफ प्रदर्शन।
किसी के समर्थन में बयान।
और फिर कुछ समय बाद उसी व्यक्ति के साथ खड़े होकर गुणगान।

क्या यही संत परंपरा है या फिर ‘जहां लाभ, वहीं विचार’ का नया सिद्धांत?

संत समाज को तय करना होगा-भगवा की गरिमा बड़ी या निजी स्वार्थ?
हरिद्वार संतों की तपस्या और त्याग की भूमि है। यहां आज भी ऐसे संत मौजूद हैं जिनके लिए भगवा वस्त्र प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि तप और जिम्मेदारी का प्रतीक है। लेकिन यदि कुछ लोग इसी भगवे को व्यक्तिगत प्रतिष्ठा, सुविधा, प्रभाव या आर्थिक लाभ का माध्यम बनाने लगें तो सवाल उठेंगे ही।

भगवा पहनना आसान है, भगवा की मर्यादा निभाना मुश्किल।
इसलिए असली सवाल यह नहीं कि कौन कितने भंडारों में पहुंचा।

असली सवाल यह है कि भंडारे की थाली बड़ी है या संत की मर्यादा?
लिफाफे का वजन भारी है या भगवे की गरिमा?
संत या ‘भगवा की आड़ में अवसरवाद’?

हरिद्वार की संत परंपरा का अपना गौरवशाली इतिहास रहा है। यहां ऐसे संत भी हुए हैं जिन्होंने अपना जीवन समाज, धर्म और सनातन परंपरा के लिए समर्पित किया। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति भगवा धारण कर उसे निजी स्वार्थ, प्रतिष्ठा या आर्थिक लाभ का माध्यम बनाता है तो इससे सबसे अधिक नुकसान उसी परंपरा की प्रतिष्ठा को होता है।

और सबसे बड़ा सवाल-
हर जगह नजर आने वाला व्यक्ति वास्तव में संत है या सिर्फ भगवा पहनकर ‘वीआईपी एंट्री’ का इंतजार करने वाला किरदार?

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