हरिद्वार। “वन नेशन, वन इलेक्शन” के मुद्दे को लेकर कांग्रेस ने भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला है। सोमवार को प्रेस क्लब सभागार में आयोजित पत्रकार वार्ता में कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता आलोक शर्मा ने कहा कि एक साथ चुनाव कराने का प्रस्ताव केवल चुनावी खर्च से जुड़ा विषय नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध देश के संघीय ढांचे, क्षेत्रीय दलों, राज्यों की स्वायत्तता और सरकारों की जवाबदेही से है। पत्रकार वार्ता में कांग्रेस जिलाध्यक्ष बालेश्वर सिंह सहित पार्टी के अन्य पदाधिकारी और कार्यकर्ता मौजूद रहे।
आलोक शर्मा ने धार्मिक मंचों के राजनीतिक इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस साधु-संतों और धर्माचार्यों का सम्मान करती है, लेकिन धार्मिक आयोजनों को राजनीतिक प्रचार का माध्यम बनाया जाना उचित नहीं है। उन्होंने संत समाज से अपील की कि “वन नेशन, वन इलेक्शन” जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक विषय पर किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले संबंधित रिपोर्ट और दस्तावेजों का अध्ययन करें।
सरकार गिरने की स्थिति पर उठाए सवाल
शर्मा ने कहा कि यदि किसी राज्य में चुनाव के बाद कार्यकाल के बीच सरकार गिर जाती है तो ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति शासन की संभावना बढ़ सकती है। उनके अनुसार इससे केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन प्रभावित होने की आशंका है। उन्होंने कहा कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में प्रत्येक राज्य और क्षेत्र की अपनी अलग प्राथमिकताएं हैं। नगर निकाय, विधानसभा और लोकसभा चुनावों में जनता के सामने अलग-अलग स्थानीय, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय मुद्दे होते हैं। सभी चुनाव एक साथ होने पर राष्ट्रीय मुद्दों का प्रभाव स्थानीय समस्याओं पर अधिक पड़ सकता है और छोटे तथा क्षेत्रीय दलों के सामने संसाधनों की चुनौती बढ़ सकती है।
जवाबदेही कमजोर होने का दावा
कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि अलग-अलग स्तर पर होने वाले चुनाव जनता को सरकारों के कामकाज का अलग-अलग मूल्यांकन करने का अवसर देते हैं। स्थानीय निकायों की जवाबदेही पार्षदों और नगर निकायों की, विधानसभा की जवाबदेही विधायकों और राज्य सरकार की तथा राष्ट्रीय स्तर पर सांसदों और केंद्र सरकार की होती है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि सभी चुनाव एक साथ होंगे तो क्या जनता के पास अलग-अलग सरकारों और जनप्रतिनिधियों के कामकाज का स्वतंत्र मूल्यांकन करने का उतना ही अवसर रहेगा।
कोविंद समिति की रिपोर्ट का किया उल्लेख
आलोक शर्मा ने रामनाथ कोविंद समिति की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि इस विषय पर संसदीय प्रक्रिया अभी जारी है और संयुक्त संसदीय समिति में भी चर्चा हो रही है। उन्होंने कहा कि इतनी महत्वपूर्ण संवैधानिक व्यवस्था पर देश में व्यापक चर्चा और जनभागीदारी जरूरी है। उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाया कि महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याओं, पेपर लीक और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने के लिए नए राजनीतिक मुद्दे सामने लाए जाते हैं। उन्होंने सरकार से जनता की रोजमर्रा की समस्याओं पर जवाब देने की मांग की।
महंगाई और चुनावी फंडिंग का मुद्दा भी उठाया
शर्मा ने पेट्रोल, गैस सिलेंडर और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों का मुद्दा उठाते हुए सरकार से महंगाई कम करने तथा रोजगार बढ़ाने के प्रयासों का हिसाब मांगा। उन्होंने चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता को लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता बताते हुए इलेक्टोरल बॉन्ड और चुनाव सुधारों का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि भारत की ताकत उसकी विविधता और संघीय व्यवस्था में है। भाषा, संस्कृति, क्षेत्र और स्थानीय परिस्थितियों के कारण राज्यों की समस्याएं अलग-अलग हैं। ऐसे में केवल राष्ट्रीय मुद्दों के प्रभाव में चुनाव होने से क्षेत्रीय समस्याएं पीछे छूट सकती हैं।
शर्मा ने कहा, “भाजपा भारत नहीं है, भाजपा हिंदुत्व नहीं है, सरकार भारत नहीं है और कोई एक व्यक्ति भारत नहीं है। भारत करोड़ों देशवासियों से मिलकर बना है।


