कलयुग का चमत्कार: अवतरित हुए ऋषियों के पिता?

तपस्या बड़ी या उपाधि, महाब्रह्मर्षि’ कौन और आधार क्या? ‘महाब्रह्मर्षि’ के दावे ने छेड़ी नई बहस

हरिद्वार। सनातन धर्म में वैराग्य, तप, साधना और ब्रह्मज्ञान को आध्यात्मिक उपलब्धि का सर्वोच्च आधार माना गया है। ऋषि परंपरा में ब्रह्मर्षि, देवर्षि, राजर्षि और महर्षि जैसी उपाधियों का उल्लेख मिलता है। हालांकि, धार्मिक जगत में सामने आ रही नई-नई उपाधियों को लेकर अब संत समाज और धर्माचार्यों के बीच सवाल उठने लगे हैं। इसी क्रम में ‘महाब्रह्मर्षि’ जैसी उपाधि को लेकर भी शास्त्रीय आधार और परंपरागत मान्यता पर बहस तेज हो गई है।


विवाद के केंद्र में कुमारानंद सरस्वती उर्फ कुमार स्वामी का नाम सामने आया है। उन्हें पहले महामंडलेश्वर, फिर जगद्गुरु और अब कथित तौर पर ‘महाब्रह्मर्षि’ की उपाधि से सम्मानित किया गया है। हालांकि, इन उपाधियों को प्रदान करने वाली संस्था, धार्मिक पीठ अथवा परंपरागत व्यवस्था और इसके शास्त्रीय आधार को लेकर स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आने पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।


सनातन परंपरा में ‘ब्रह्मर्षि’ सामान्य सम्मानसूचक शब्द नहीं रहा है। ऋषि विश्वामित्र को कठोर तप, साधना और ब्रह्मज्ञान के कारण ब्रह्मर्षि के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। इसी प्रकार महर्षि वाल्मीकि और वेदव्यास ने अपनी साधना, ज्ञान और साहित्यिक योगदान से भारतीय आध्यात्मिक परंपरा को समृद्ध किया। ऐसे में ‘महाब्रह्मर्षि’ जैसी उपाधि के प्रचलन को लेकर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इसका शास्त्रीय और परंपरागत आधार क्या है।


धर्म से जुड़े जानकारों के अनुसार वेदों में ऋषि परंपरा और ब्रह्मज्ञान से संबंधित अनेक संदर्भ मिलते हैं, जबकि पुराणों और महाकाव्य साहित्य में ब्रह्मर्षि, देवर्षि, राजर्षि और महर्षि जैसी श्रेणियों का उल्लेख मिलता है। लेकिन ‘महाब्रह्मर्षि’ को एक कोई भी शास्त्रोक्त प्रमाण नहीं है। हमारे जिन पूर्वजों ने हजारों वर्ष तपस्या कर ज्ञान और ध्यान के बल पर ख्याति पायी। जो मंत्र दृष्टा कहलाए और ब्रह्म का उन्होंने आत्मसात किया, वे ब्रह्मर्षि कहलाए। किन्तु इन्होंने तो उनको पीछे छोड़ते हुए महाब्रर्ह्षि की उपाधि प्राप्त कर ली। इसको देखते हुए कहा जा सकता है कि ये हमारे ऋषियों के भी पिता अवतरित हो गए।


यदि यह उपाधि किसी धार्मिक संस्था, संत परंपरा या धर्माचार्य द्वारा प्रदान की गई है तो उस संस्था का नाम, उसकी परंपरा, अधिकार क्षेत्र और उपाधि प्रदान करने की प्रक्रिया सार्वजनिक की जानी चाहिए। यह चर्चा भी है कि धार्मिक उपाधियों का आधार व्यक्तिगत प्रचार और प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि साधना, विद्वता और परंपरागत मान्यता होनी चाहिए।


रामकृष्ण परमहंस, तोतापुरी महाराज, उड़ीया बाबा और बामा खेपा जैसे अनेक संत अपनी साधना और आध्यात्मिक प्रभाव के लिए प्रसिद्ध रहे, लेकिन उनकी पहचान मुख्य रूप से उनके आध्यात्मिक जीवन और साधना से बनी। ऐसे में आज धार्मिक उपाधियों की बढ़ती होड़ सनातन के लिए बड़ा खतरा कही जा सकती है। जिस प्रकार से उपाधियों को लेकर इनका मोह बढ़ता जा रहा है, उस हिसाब से शीघ्र ही यह स्वंय को भगवान घोषित कर दें तो कोई हैरानी की बात नहीं होनी चाहिए।


इस मामले ने अखाड़ों और धर्माचार्यों की भूमिका को लेकर भी प्रश्न खड़े किए हैं। संत समाज के जानकारों का कहना है कि यदि परंपरागत व्यवस्था से अलग कोई नई धार्मिक उपाधि प्रचलन में लाई जा रही है तो उसके शास्त्रीय आधार और मान्यता को लेकर धर्माचार्यों तथा विद्वानों को स्पष्ट मत रखना चाहिए। वहीं, किसी व्यक्ति की आध्यात्मिक उपलब्धि अथवा धार्मिक उपाधि पर अंतिम निर्णय संबंधित धार्मिक संस्थाओं और विद्वानों के शास्त्रीय परीक्षण का विषय माना जाना चाहिए।


विवाद का एक अन्य पहलू धार्मिक विद्वता से भी जुड़ा है। उपाधि प्रदान किए जाने के दावों के साथ संबंधित व्यक्ति की शास्त्रीय विद्वता, वेद-अध्ययन और परंपरागत ज्ञान की कसौटी पर भी चर्चा हो रही है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि किए बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। मजेदार बाद यह कि ब्रह्मर्षि बनने के बाद भी वेद की एक ऋचा का यह विशुद्ध सस्वर पाठ नहीं कर सकते। इनको देखते कहा जा सकता है कि ये सप्त ऋषियों के पिता अवतरित हुए हैं।


कुल मिलाकर सवाल उपाधि से अधिक उसके आधार और प्रमाण का है। यदि ‘महाब्रह्मर्षि’ सनातन धर्म की प्रमाणित परंपरा का हिस्सा है तो इसके शास्त्रीय स्रोत, परंपरा, मान्यता और उपाधि प्रदान करने वाली संस्था का विवरण सामने आना चाहिए। वहीं, यदि इसका कोई स्पष्ट परंपरागत आधार नहीं है तो ऋषियों और ब्रह्मर्षियों की हजारों वर्ष पुरानी तपस्या से जुड़ी उपाधियों को व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का माध्यम बनाने पर गंभीर धार्मिक विमर्श जरूरी है। सनातन परंपरा में उपाधि से अधिक साधना को महत्व दिया गया है। ऐसे में ‘महाब्रह्मर्षि’ की उपाधि को लेकर सवाल उठना लसजमी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *