हरिद्वार। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आध्यात्मिक चिंतक MAAsterG ने देश की राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ व्यक्ति की आंतरिक स्वतंत्रता का सवाल उठाते हुए कहा कि 1947 में भारत आज़ाद हुआ, लेकिन आज भी मनुष्य अपने दुख, चिंता, भय, अहंकार और ‘मैं-मेरा’ की भावना का गुलाम बना हुआ है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता दिवस केवल उत्सव और अवकाश का दिन नहीं, बल्कि स्वयं से यह प्रश्न पूछने का अवसर है कि “देश आज़ाद हुआ, पर क्या मैं आज़ाद हूँ?”
MAAsterG के अनुसार मनुष्य के लिए वास्तविक स्वतंत्रता केवल बाहरी बंधनों से मुक्ति नहीं, बल्कि भीतर की अशांति और दुखों से मुक्ति है। उन्होंने कहा कि देश स्वतंत्र हो सकते हैं, उनकी सीमाएं बदल सकती हैं, लेकिन मनुष्य के जीवन का वास्तविक उद्देश्य अपनी आंतरिक गुलामी को पहचानकर उससे मुक्त होना है।
उन्होंने कहा कि एक स्वतंत्र देश में रहने के बावजूद यदि व्यक्ति लगातार चिंता, तनाव, दुख और असंतोष से घिरा है, तो उसे अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर विचार करना चाहिए। उनके अनुसार आज के समय में बाहरी विकास तेजी से हुआ है, लेकिन व्यक्ति के भीतर शांति और संतोष का विकास उसी गति से नहीं हो पाया है।
‘अंग्रेजों का दुख गया, अपनों का दुख आया’
MAAsterG ने कहा कि स्वतंत्रता से पहले देश को अंग्रेजी शासन का दंश झेलना पड़ा, लेकिन आज व्यक्ति के सामने अलग प्रकार की चुनौतियां हैं। उन्होंने कहा कि “देश तो आज़ाद हो गया, पर मैं अपने दुखों से आज़ाद नहीं हुआ।” उनके अनुसार मनुष्य को यह समझने की आवश्यकता है कि उसके जीवन में वास्तविक बंधन कहां हैं और वह उनसे कैसे मुक्त हो सकता है।
उन्होंने स्वतंत्रता दिवस को आत्मचिंतन का अवसर बताते हुए कहा कि इस दिन केवल पतंग उड़ाने, मिठाइयां खाने और उत्सव मनाने तक सीमित रहने के बजाय व्यक्ति को अपने भीतर भी झांकना चाहिए।
महापुरुषों के जीवन से आंतरिक स्वतंत्रता का संदेश
MAAsterG ने गौतम बुद्ध, महावीर, ईसा मसीह, मोहम्मद, कबीर, फरीद, रामकृष्ण परमहंस, साईं बाबा, मीराबाई, सहजो बाई, लल्ला बाई, लाओत्से और सुकरात जैसे आध्यात्मिक एवं दार्शनिक व्यक्तित्वों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन महापुरुषों ने मनुष्य को बाहरी उपलब्धियों से आगे बढ़कर आंतरिक शांति और मुक्ति का मार्ग दिखाया।
उन्होंने कहा कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में मुक्ति को जीवन के सर्वोच्च लक्ष्यों में माना गया है। उनके अनुसार वास्तविक आज़ादी का अर्थ अहंकार और ‘मैं-मेरा’ की भावना से ऊपर उठना तथा जीवन में शांति और आनंद को अनुभव करना है।
बाहरी विकास के साथ जरूरी है आंतरिक विकास
MAAsterG ने आधुनिक जीवनशैली पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि भौतिक और तकनीकी विकास के बावजूद परिवारों में संवाद और साथ बैठकर भोजन करने जैसी सामान्य खुशियां कम होती जा रही हैं। उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति के पास सुविधाएं तो बढ़ जाएं, लेकिन मन की शांति और पारिवारिक सुख कम हो जाएं, तो विकास को अधूरा माना जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि बाहर का विकास अच्छी बात है, लेकिन अंदर का विकास भी उतना ही आवश्यक है। व्यक्ति को यह समझना होगा कि वास्तविक सुख केवल बाहरी परिस्थितियों को बदलने से नहीं, बल्कि अपने भीतर परिवर्तन लाने से प्राप्त होता है।
युवाओं से किया जागरूक होने का आह्वान
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर युवाओं का आह्वान करते हुए MAAsterG ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी को केवल देश के विकास में योगदान देने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपने मानसिक और आध्यात्मिक विकास पर भी ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि युवा स्वयं जागरूक होंगे तो वे समाज और दुनिया को भी नई दिशा देने में भूमिका निभा सकते हैं।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति जहां है, वहीं से परिवर्तन की शुरुआत कर सकता है। इसके लिए सबसे पहले स्वयं को पहचानना और अपनी आंतरिक गुलामी को समझना आवश्यक है।
‘सच्ची आज़ादी का संकल्प लें’
MAAsterG ने स्वतंत्रता दिवस पर लोगों से सच्ची स्वतंत्रता का संकल्प लेने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि अहंकार, भय, दुख और मानसिक अशांति से मुक्ति की दिशा में उठाया गया प्रत्येक कदम व्यक्ति को वास्तविक स्वतंत्रता के करीब ले जाता है।
उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के कर्म और निश्चय संबंधी संदेश का उल्लेख करते हुए दृढ़ निश्चय के साथ कर्म करने पर जोर दिया। उनका कहना है कि जब व्यक्ति अपने भीतर परिवर्तन लाता है, तभी उसके जीवन में वास्तविक आनंद और शांति प्रकट हो सकती है।
उन्होंने कहा कि “देश आज़ाद हुआ, पर मैं अभी आज़ाद नहीं हूँ”— यह सवाल प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता दिवस पर स्वयं से पूछना चाहिए। उनके अनुसार जब बाहरी विकास के साथ व्यक्ति का आंतरिक विकास भी होगा, तभी स्वतंत्रता का अर्थ अधिक व्यापक और सार्थक रूप में सामने आएगा।


