आइए जानते हैं कि हमारे शरीर के किन वेगों को रोकना है और किन को नहीं।
काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष, अंहकार इत्यादि मानसिक वेग होते हैं, जिनको रोकना अत्यन्त लाभकारी है, किन्तु अधोवायु, विष्ठा, मूत्र, जंभाई, आँसू, छींक, डकार, वमन, शुक्र, भूख, प्यास, श्वास और नींद ये तेरह शारीरिक वेग हैं। इनको रोकना स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त ही हानिकारक हैय क्योंकि इनका रोकना अत्यन्त ही दारुण व रोगकर है। अतः भूलवश भी इन वेगों को कदापि नहीं रोकना चाहिए।
1:- पेशाब-मूत्र
पेशाब-मूत्र के वेग को रोकने से पेडू व लिंगेन्द्रिय में दर्द होता है। मूत्र रुक-रुककर और थोड़ा-थोड़ा कष्ट के साथ त्याग होता है, सिर में पीड़ा होती है. शरीर सीधा नहीं होता है, पेट में अफारा होता है तथा जाँघों और पेडू के जोड़ों में शूल से चलते हैं।
उपरोक्त दशा होने की स्थिति में-यानी मूत्राघात में पसीने निकालना, पानी में घुसकर स्नान करना, मालिश कराना, भोजन के पहले और भोजनोपरान्त गाय का घी सेवन करना तथा तीन प्रकार के बस्ति कर्म करना ष्महर्षि चरकष् द्वारा लिखित ष्चरक संहिताष् के अनुसार शान्ति कारक उपाय हैं।
2:- पाखाने-यानी मल
पाखाने-यानी मल का वेग रोकने से माधावाचार्य के अनुसार पेट में गुड़गुड़ाहट व दर्द होता है, गुदा में कतरने सदृश पीड़ा होती है, शौच साफ नहीं होता है, डकारें आती हैं या मुख से मल निकलता है।
चरक के मतानुसार-पक्वाशय और मस्तक में पीड़ा होती है, अधोवायु और मल (दोनों) रुक जाते हैं, नाभि मल से ल्हिस जाती है और पेट फूल जाता है। चरक के मतानुसार ऐसी दशा में शान्ति (निवारण) हेतु स्वेदन, अभ्यंग, अवगाहन, बस्ति कर्म और वायु को अनुलोमन करने वाले खान-पान का प्रयोग करना हितकर है।
3:- अधोवायु
अधोवायु-यानी गुदा द्वारा निकलने वाली वायु (हवा) को किसी कारणवश रोकने से अधोवायु, मल और मूत्र ये रुक जाते हैं, पेट फूल जाता है, अनायास ही थकान सी अनुभव होने लगती है, पेट में वायु से दर्द होता है एवं वायु के अन्य और भी अनेकों उपद्रव होते हैं। उपरोक्त स्थिति में स्नेह, स्वेद और बस्ति कर्म करना तथा वायु का अनुलोमन करने वाले खाद्य व पेय पदार्थों का सेवन करना हितकर है।
4:- डकार
डकार के वेग को रोकने से कण्ठ और मुख का भारी-सा अनुभव होना, एकदम से नोचने सदृश दर्द होना, किसी की समझ में न आये ऐसी बातें कहना आदि रोग होते हैं। आचार्य चरक भी कहते हैं कि हिचकी, खाँसी, अरुचि, कम्प और हृदय व छाती का बंधा हुआ-सा प्रतीत होना आदि रोग (कष्ट) होते हैं।
उपरोक्त दशा में हिचकी रोग की चिकित्सा सदृश ही चिकित्सा करना लाभप्रद होता है, क्योंकि हिचकी और श्वास का कारण कफ युक्त वायु है तथा इन दोनों का स्थान भी आमाशय है। अतः ऐसे उपाय करने चाहिए, जिससे छिद्रों में चिपटा हुआ कफ पिघले और श्वास वायु अपनी राह में ठीक प्रकार से (प्राकृत रूप से) आने-जाने लगे। रोगी को स्वेद कराकर चिकने भोजन देना चाहिए, जिससे कफ बढ़े, तदुपरान्त किसी औषधि द्वारा (जैसे पीपल, सेंधा नमक और शहद, जो औषधि वायु विरोधी न हो) से रोगी को वमन करा देना चाहिए। वमन होने से कफ निकल जायेगा। छिद्रों के शुद्ध होने से वायु स्वच्छन्दतापूर्वक विचरण करने लग जायेगा, परिणाम स्वरूप रोगी को आरामध्लाभ अनुभव होगा। यदि फिर भी कुछ दोष शेष रह जाये, तो आयुर्वेदिक धूम्रपान द्वारा निकाल देना चाहिए। हिचकी नाशक कुछ परीक्षित घरेलू प्रयोग, जो इस दशा में भी उपयोगी है। नीचे लिखे हैं-
(1) नाक में हीरा हींग (सर्वोत्तम क्वालिटी की हींग को हीरा हींग कहते हैं।) की धूनी दें।
(2) जरा सा सेंधा नमक जल में पीस कर घोलकर सुँघायें।
(3) बारीक पिसे सोंठ को पुराने गुड़ में मिलाकर सुँघायें।
(4) असली शहद चटायें।
(5) शहद व काला नमक मिलाकर बिजौरे का रस पिलायें।
(6) डरावनी, भययुक्त या आश्चर्यजनक रोगी से बात कहने से, प्राणायाम करने से व मन, हृदय पर चोट लगने वाली बात कहने से रोगी की ष्हिचकी आना बन्द (आराम) हो जाती है। बाद में रोगी से स्थिति साफ कर देनी चाहिए कि उसके कष्ट को दूर करने के लिए ही ऐसी बात कही गयी थी।
5:- छींक
छींक आने के वेग को रोकने से गर्दन के पीछे की ष्मन्याष् नामक नस जकड़ जाती है, सिर में शूल चलते हैं, आधा मुँह टेढ़ा हो जाता है। इन्द्रियाँ दुर्बल हो जाती हैं तथा अर्धांग में वात रोग हो जाता है। ष्आचार्य चरकष् कहते हैं कि गर्दन का जकड़ना, मस्तक शूल, लकवा, आधा सीसी (माइग्रेन) और इन्द्रियों की दुर्बलता होती है। उपरोक्त दशा में-हँसली के ऊपरी भाग में मालिश करना, स्वेदन, नस्य और आयुर्वेदिक धूम्रपान का प्रयोग करना, वातनाशक क्रिया करना तथा भोजन के पूर्व और भोजनोपरान्त गाय के घी का सेवन करना लाभकारी उपाय है।
6:- वमन
वमन के वेग रोकने, अर्थात आती हुई कै (उल्टी) को रोकने से खुजली चकत्ते, अरुचि, मुख पर झाइयाँ, सूजन, पीलिया, मितली (सूखी ओकारी) और विसर्प, ये उपद्रव होते हैं। आचार्य चरक कोढ़ (लेप्रोसी) भी लिखते हैं। उपरोक्त रोगों को दूर करने के लिए भोजनोपरान्त वमन करानी चाहिए। उसके उपरान्त आयुर्वेदिक धूम्रपान और लंघन कराने चाहिए तथा फस्द खोलनी चाहिए। इसके अतिरिक्त रुखे पदार्थों का सेवन, कसरत और जुलाब ये सब कार्य भी लाभकारी हैं।
7:- शुक्र
माधवाचार्य के अनुसार-शुक्र, यानी वीर्य के वेग को रोकने से मूत्राशय में सूजन, गुदा और फोतों (अण्डकोष) में पीड़ा, मूत्र त्याग कष्ट से होना, शुक्र की पथरी और वीर्य का रिसना आदि रोग होते हैं। ष्आचार्य चरक” लिखते हैं कि मैथुन करते समय स्खलित होते वीर्य को रोकने से लिंग और फोतों में दर्द, शरीर टूटना, अंगड़ाई आना, हृदय में पीड़ा तथा मूत्र का रुक-रुककर होना ये उपद्रव होते हैं। उपरोक्त स्थिति में-मालिश, अवगाहन, अर्थात् गोते लगाकर जल (नदी) में स्नान करना, आयुर्वेदिक शराब पीना, मुर्गे का माँस खाना, शालि चावल खाना, दूध पीना, निरुह बस्ति तथा मैथुन करना, ये लाभकारी उपाय हैं।
8:- भूख
भूख के वेग को रोकने से तन्द्रा, शरीर टूटना, अरुचि, थकान तथा नजर (दृष्टि) कम होना-ये रोग होते हैं। आचार्य चरक लिखते हैं-देह में दुर्बलता, निर्बलता, कृशता, विवर्णता, अंग टूटना और भ्रम ये लक्षण होते हैं। उपरोक्त दशा में-चिकने, गर्म और हल्के (शीघ्र पाची) भोजन देना हितकर है।
9:- प्यास
प्यास के वेग को रोकने से कण्ठ व मुँह सूखते हैं। कानों से कम सुनाई देता है और हृदय में पीड़ा होती है। आचार्य चरक श्रम और श्वास का होना भी लिखते हैं। उपरोक्त दशाध्रोगों में शीतल क्रिया और तर्पण करना हितकर है अथवा नीचे लिखे उपाय भी लाभकारी हैं-
(1) गीले कपड़े को रोगी के शरीर पर लपेटें।
(2) चावलों के जल में असली शहद मिलाकर सेवन करायें।
(3) अनार, बेर लोध और बिजौरे नींबू को एक साथ पीस कर रोगी के माथे पर लेप करें।
(4) खस का इत्र सुँघायें, खस के पंखे से रोगी को हवा करें। सरसब्ज बाग की रोगी को सैर करायें।
(5) 60 ग्राम मिश्री को शीतल जल में घोलकर शर्बत बना लें। इस शर्बत में छोटी इलायची 4-5 नग, कपूर एक चावल भर, लौंग 2-3 नग, काली मिर्च 10-15 नग, इन सभी को बारीक पीस कर मिलाकर तथा बारीक कपड़े से छानकर पिलायें। यह शर्करोदक है। यह अत्यन्त ही उत्तम औषधि है। यह वीर्यवर्द्धक, पेट की जलन का नाश करने वाला, दस्त साफ लाने वाला, सुस्वादु, वात, पित्त और रक्त विकार नाशक गुणों से भरपूर है। इसके प्रयोग से बेहोशी, जी मिचलाना और प्यास शान्त होती है।
10:- जंभाई
जंभाई के वेग को रोकने से गर्दन के पीछे की नस और गले का जकड़ जाना, मस्तक में वादी के विकार होना, नासा रोग, नेत्र रोग, मुख रोग और कर्ण रोग जोर से होना ये सब उपद्रव होते हैं। आचार्य चरक लिखते हैं कि-अंगों का दब जाना, आश्रेपक वायु, संकोच, शरीर के अंगों का सो जाना और काँपना ये उपद्रव हते हैं। जंभाई को रोकने से उत्पन्न हुए रोगों में वातनाशक औषधि रोगी को देना हितकर है।
11:- आँसू
आँसुओं के वेग को रोकने से मस्तक का भारीपन, नेत्र रोग और पीनस ये रोग जोर से होते हैं। ष्चरक संहिताष् में आचार्य चरक लिखते हैं कि जुकाम, आँखों का रोग, हृदय रोग, अरुचि और भ्रम ये रोग होते हैं।
इस स्थिति में नींद भर सोना, हल्की-सी उत्तम क्वालिटी की शराब का सेवन, चित्त प्रसन्न करने वाली प्यारी प्यारी बातों का कहना तथा मीठा-मीठा-सा गाना बजाना (संगीत) आदि कार्य हितकर हैं। निद्रा-निद्रा के वेग को धारण करने से जंभाईयाँ आना, अंग टूटना, नेत्रों व मस्तक का जड़ हो जाना और तन्द्रा ये रोग होते हैं। उपरोक्त दशाओं में शान्तिपूर्वक सोना और किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा पैर के तलुवों और हाथों की हथेलियों का सहलाना हितकर है।
12:- सांस
इस दशा में रोगी को आराम देना चाहिए तथा वात हरणकारी, अर्थात् बादी का नाश करने वाली क्रियायें करना लाभकारी है। महर्षि चरक का उपदेश-महान् आयुर्वेदज्ञ चरक का कथन है कि-शरीर सम्बन्धी उपरोक्त तेरह वेगों को कदापि नहीं रोकना चाहिए, ताकि ऐसे भयानक रोग उत्पन्न न हो सकें। शारीरिक शक्ति के अनुसार कसरत करने से शरीर हल्का और मजबूत होता है, काम करने और क्लेश सहने का सामर्थ्य होता है। तीनों दोषों (वात, पित्त, कफ) की शान्ति होती है, भूख बढ़ती है, किन्तु इसके भी अधिक करने से थकान, ग्लानि, क्षय रोग (टी०बी०), प्यास, रक्तपित्त, प्रतमक श्वास, खाँसी, ज्वर और वमन-ये उपद्रव होते हैं। अतः बुद्धिमान व्यक्तियों को आवश्यकता अथवा शारीरिक शक्ति से अधिक कसरत करना, बहुत बोलना, बहुत हँसना, बहुत रास्ता चलना, अधिक स्त्री प्रसंग, सहवास करना और बहुत जागना (जागरण) इनसे सदैव बचना चाहिए।
Dr. (Vaidhya) Deepak Kumar
Adarsh Ayurvedic Pharmacy
Kankhal Hardwar
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