प्रेम में खो जाना ही सच्ची पूजा है।

क्या हम पूजा का अर्थ समझते हैं ? पूजा शब्दों से नहीं होती, परमात्मा की पूजा में शब्दों का कोई स्थान नहीं है। अगर पूजा में शब्द चल रहे हैं तो वो पूजा शुद्ध पूजा नहीं है; चाहे कोई मंत्र बोल रहा है, चाहे कुछ भी कर रहा है। इसलिए जो पूजा तुम नींद में, आराम में कर सकते हो, वही पूजा तुमजागते हुए नहीं कर सकते। जब तुम्हारा मन पूरा समर्पित होता है तो तुम उस एक के साथ होते हो। दूसरे शब्दों में तुम उस एक परमात्मा के प्रेम में होते हो।


तुम्हें याद है, कभी जीवन में किसी के साथ प्यार हुआ हो, और अगर लव मैरिज हो गई हो, तो उस समय की स्थिति देखो और आज भी तुम उतना ही खोए हुए हो। उस समय किसी और चीज़ का ध्यान नहीं आता था; सारा समय उसी का ध्यान रहता था। जब अगर बाहर निकल थे, ऑफिस या कहीं पर भी, तो लोग पूछते थे, “कहाँ खोए हुए हो? तुम्हारा ध्यान किधर है?” वही स्थिति है, जब तुम उस एक के विचारों में खोए हो और दूसरे का कोई विचार नहीं है; उस एक के विचारों में लगातार, अटूट डूबे रहना, यही पूजा है।


पूजा का मतलब उस एक में डूब जाना है। लेकिन याद करो, जब तुम किसी के प्रेम में आते हो, तो धीरे-धीरे प्रेम के साथ इच्छाएँ शुरू हो जाती हैं कि इसके पास पैसा है, यह अमरीकन है, या कुछ और। मन में माँगें पैदा होने लगती हैं। जहाँ माँग और कुछ भी संसारी इच्छा शुरू हो गई, वहीं पर प्रेम, पूजा और प्रार्थना गिरना शुरू कर देती है क्योंकि पूजाएँ खत्म होना शुरू हो जाती हैं, जैसे ही उससे कोई माँग या इच्छाएँ जुड़ जाएँ; चाहे वो पैसे, वासना को लेकर हो, या जो तुम उससे चाहते हो, कि वह करे। तब तुम्हारा प्यार गिरना शुरू हो जाता है।


प्रेम का अर्थ है उस एक के साथ होना, और वह एक परमात्मा है। इसलिए संसार में जिनको हम परमात्मा कहते हैं, उन्होंने बार-बार कहा—“लव इज गॉड।” समझाने के लिए कहा कि प्रेम ही परमात्मा है। उन्होंने ये नहीं कहा कि भगवान से प्रेम; उन्होंने कहा प्रेम ही परमात्मा है। पर कौन सा प्रेम? वह प्रेम जो मरता नहीं, जो निरंतर बढ़ता है और सीमाओं के पार चला जाता है, वही परमात्मा है। चाहे सामने वाले का प्रेम हो या न हो, सच्चा प्रेम वापसी नहीं माँगता। वह यह नहीं सोचता कि सामने वाला भी मुझे प्रेम करे।


जब प्रेम में ‘मैं’ आ जाती है, तो माँग शुरू हो जाती है। शुद्ध प्रेम में माँग नहीं होती कि “मैं उसे प्रेम करता हूँ, तो वह मुझे क्यों नहीं करती?” समझना! प्रेम माँग नहीं करता। समझो, कभी अचानक किसी को देखा और देखते ही प्यार हो गया। पड़ोस में कोई रहता है, एक नज़र पड़ी और तुम उसकी ओर खिंचते चले गए। अब मन करता है कि बस उसे देखते रहो, कब खिड़की खुले, दरवाज़ा खुले और वह दिख जाए। यही खिंचाव, यही प्रेम जब परमात्मा में डूबने के लिए होता है तो इसका अर्थ है उसके साथ एक होना।
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