सनातन परंपरा, भजन और आधुनिक दिखावे में फंसता भगवा

शौक में शोक छिपा, फिर पीछे भाग रहा भगवा
हरिद्वार।
सनातन शास्त्रों में भोजन और भजन को एकांत में, शुद्ध और निष्कपट भाव से करने का निर्देश मिलता है। लेकिन वर्तमान समय में धार्मिक आचरण और उसके सार्वजनिक प्रदर्शन को लेकर समाज में नई बहस खड़ी हो गई है।
वर्तमान में भोजन की बात छोड़ दें तो भजन को तो दिखावा बनाकर छोड़ दिया है, खासकर भगवाधारियों ने। आलम यह है कि यदि एक लोटा जल भगवान शिव पर चढ़ा दिया तो सोशल मीडिया पर उसके दस फोटो डाल दिए जाते हैं। अनुष्ठान यदि किया जाता है तो ऐसा सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है कि मानो दूसरे भगवान वही हैं।


आजकल कई लोग, विशेषकर भगवाधारी और संन्यासी परंपरा से जुड़े कुछ व्यक्ति, अपने धार्मिक कार्यों को भी प्रदर्शन का माध्यम बना रहे हैं। सोशल मीडिया पर पूजा-पाठ, अनुष्ठान और धार्मिक क्रियाओं की तस्वीरें और वीडियो साझा करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। एक लोटा जल भगवान शिव पर अर्पित करने जैसी साधारण क्रिया को भी कई बार सोशल मीडिया पर बार-बार प्रदर्शित किया जाता है, जिससे यह प्रश्न उठता है कि साधना की भावना अधिक महत्वपूर्ण है या उसका प्रदर्शन।

कुछ लोगों द्वारा पूजा-पाठ को अब लाइव प्रसारण के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा है, जिससे निजी आध्यात्मिक साधना का स्वरूप सार्वजनिक मंच पर बदलता जा रहा है।
इसी के साथ संन्यास परंपरा में जहाँ सादगी और भस्म को प्रतीकात्मक श्रृंगार माना गया है, वहीं आज कुछ संन्यासी और धार्मिक प्रवक्ता आधुनिक सौंदर्य प्रसाधनों, विशेष वस्त्रों और महंगे परिधानों का उपयोग करते देखे जा रहे हैं। यह प्रवृत्ति संन्यास के मूल भाव, त्याग और वैराग्य से भटकाव को दर्शाती है। इसके साथ ही समस्त रिश्ते-नातों, कामनाओं का त्याग कर संन्यास धारण करने वाले लाखों रुपये खर्च कर पदवी के पीछे मतवाले हुए घूम रहे हैं।

इस संदर्भ में एक प्रसंग का उल्लेख करना जरूरी है कि एक बार स्वामी रामकृष्ण परमहंस महाराज को एक अंगवस्त्र भेंट किया गया था। बताया जाता है कि उन्होंने उसे स्वीकार तो किया, और अपने कांधे पर डाल लिया। इसी दौरान वह मंदिर गए और भगवान को साष्टांग किया। जैसे ही वह सांष्टांग करने के लिए झूके तो अंग वस्त्र गिर गया। वस्त्र गिरते ही उनका ध्यान वस्त्र गिरकर मैला न हो जाए, इस पर गया। मन में ऐसा विचार आते ही उन्होंने उसे त्याग दिया, यह कहते हुए कि जो वस्त्र साधना और भगवान के बीच बाधा बने, उसका कोई औचित्य नहीं। किन्तु आज कुछ भगवाधारियों का विलासितापूर्ण वस्तुओं को संग्रह करने और उपयोग का शौक में चढ़ा हुआ है, किन्तु वह इस बात को भूल जाते हैं की शौक में ही शोक छिपा होता है।

इस प्रसंग के आधार पर यह तर्क दिया जाता है कि विलासिता या बाहरी आकर्षण साधना के मार्ग में बाधा बन सकते हैं। वर्तमान समय में कुछ धार्मिक व्यक्तित्व भौतिक सुख-सुविधाओं और आकर्षक जीवनशैली की ओर झुकते दिखाई देते हैं, जबकि परंपरा में सादगी और त्याग को सर्वोच्च माना गया है।


हालाँकि दूसरी ओर यह भी कहा जा रहा है कि कुछ लोग अपनी पहचान, संदेश और धार्मिक विचारों के प्रचार के लिए आधुनिक माध्यमों का उपयोग कर रहे हैं, जिसे पूरी तरह नकारात्मक नहीं कहा जा सकता।कुल मिलाकर अभी तो अपराधी और ऊंगूठा छाप जगद्गुरु, महामण्डलेश्वर आदि बनाए जा रहे हैं। वह दिन दूर नहीं जब ऐसे गली-गली भगवान बनकर घूमते नजर आएंगे। आज भी कुछ तो अपने आप को ऐसा प्रदर्शित करते हैं, जैसे 16 कलाओं से परिपूर्ण वह ही हों।

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