एप्सटीन फाइल्स – प्रतिष्ठित लोगों की हैवानियत

आज हर तरफ एप्सटीन फाइल्स की खबरें आती जा रही हैं। क्या है ये एप्सटीन फाइल? संसार में जहाँ-जहाँ पैसा है, जहाँ-जहाँ सत्ता और यश है वहाँ-वहाँ ऐसे इंसान पैदा हो जाते हैं । आज इन फाइलों में किनके नाम आ रहे हैं ? जो ऊँची-ऊँची कुर्सियों पर बैठे हुए हैं, जिनके पास धन की शक्ति है । कोई शराब पीते हैं, ड्रग्स लेते हैं, एक दिन वो ऊर्जावान हैं इसके आगे क्या? कामवासना। जब अंदर कामवासना है तो कोई भोगेगा।

कामवासना ऐसी है जो जिंदगी के साथ चिपकी हुई है, वो उम्र नहीं दिखती । जैसे ही बच्चा दस-बारह साल का होता है अंदर इंद्रियां जागृत होने लगती हैं और सबसे बड़ी इंद्री वासना की है। जैसे ही बच्चे बड़े होते हैं, जैसे आज स्कूलों में बारह-चौदह साल की उम्र के बच्चों को देखो या फिर अट्ठारह साल के गिनती मेंहेल बच्चों को देखो, ड्रिंक्स, ड्रग्स छोटी उम्र से ही शुरू कर रहे हैं । आज क्यों बच्चे एकांत चाहते हैं और परिवार से अलग होते जा रहे हैं? डिप्रेशन इतना क्यों बढ़ रहा है? छोटे-छोटे बच्चे भी कहते हैं कि वे ‘रिलेशनशिप’ यानी संबंध में हैं। ये खेल कहाँ नहीं चल रहा है।

अब एपस्टीन फाइल खुल गई है तो सब उसकी चर्चा में लग गए हैं। अगर संसार में सबकी फाइलें खुल गईं तो कोई साफ-सुथरा सवाल मुश्किल हो जाएगा। ऐसा कौन सा इंसान है जिसके अंदर वासना नहीं है, और जिसने कभी किसी परपुरुष या परस्त्री के विचार नहीं के लिए?

बाकी अब ये मत सोचो की उसका नाम आ रहा है, इसका नाम आ रहा है। सभी के कपड़ों के अंदर झाँक कर देखो, सब एक ही हैं। इस संसार में भोगी कौन नहीं है, कौन है शरीफ?

जिसने जीवन का ज्ञान लिया, सत्य का ज्ञान लिया सिर्फ उसकी वासना सुखाती चली जाती है। सुइयों का अर्थ है कि वो अपने विचारों को वासना से इतना दूर ले जाता है कि वो परमात्मा ही हो जाता है। परमात्मा कौन ? वो जो अपनी इंद्रियों से पार हो गया, इंद्रियातीत हो गया । काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार के पार हो गया।

हम बाहरी रूप में धर्म का नाम ज़रूर लेते हैं, जैसे कोई श्रीराम, श्रीकृष्ण, बुद्ध, महावीर, गुरु नानक देव, जीसस का नाम लेते हैं, पर अंदर उनका संदेश तो लिया ही नहीं। छवियां अपनी इंद्रियों से उठने का रास्ता बताया कि पूरी जिंदगी इंद्रियों में मत बंधा रहना।

अगर भगवान का ज्ञान लिया होता तो बच्चियों के साथ कोई कुकर्म नहीं कर सकता। ज्ञान पाने के बाद ऐसा कोई नहीं करेगा, पर अज्ञान है इसलिए ऐसी जागरूकता होती हैं। जो कर्म करता है वो अपनी सजाओं को भी भोगता है। ‘जैसे कर्म करेगा वैसे फल देगा भगवान, ये है गीता का ज्ञान’।

ये कामवासना का खेल तो हर गली, उठाकर, शहर, देश में है, बस वो पकड़े नहीं जाते! जगह-जगह ऐसे बाज़ार चल रहे हैं। कभी सोचा की ये क्यों चल रहे हैं? इन फाइल्स में थोड़ी ऊंची कुर्सियों वालों के नाम आ गए, तो संसार के लिए बड़ी खबर बन गयी है, पर सच तो ये है की ये सब चल ही रहा है।

हमें बस सहज रहना है, अपने कर्मों पर दृष्टि रखनी है। इसलिए मौज में रहो, खुश रहो। ये बाहर का नाटक तो युगों से ही चलता आया है और चलता ही रहेगा। जहाँ सत् है वहाँ असत् भी है। कलयुग में यहाँ सत् की बातें ज़रूर होंगी, धर्म की बातें होंगी, पर धर्म को कोई जाएगा नहीं, कोई जागेगा नहीं, पर सब अपने कर्मों का ही फल भोगेंगे। इस शरीर से सभी को निकलना है। श्मशान घाट या कब्रिस्तान नहीं पाठकों कि मिनिस्टर आया है या भिखारी आया है। सबको एक ही जगह मिट्टी में दफनाते हैं या जलाते हैं। इसलिए हमें अपनी को देखना है, स्वयं में बैठना है, मौज में जीवन की खुशहाली लेते हुए इस जन्म-मरण के चक्रव्यूह को तोड़ परमात्मा को उपलब्ध हो जाना है।

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